गीत
एडस पीड़िता की व्यथा
मैंने तुझ पर जीवन वारा
तूने यह कैसा साथ दिया
क्यूं उजाड़ा यौवन मेरा
टूटा हुआ विश्वास दिया
टूटा हुआ………………

उसके पास से गुज़रा तो
आँखों में उसकी नमीं देखी
दर्द का गहरा समन्दर देखा
फटती हुई जमीं देखी।
फटती हुई……………………

कहने लगी वो दर्द से व्याकुल
मालिक ने मुझे खास दिया
एक अंधेरी रात दी और
भटका हुआ सहवास दिया।
भटका हुआ………………….

मन के जीते जीत है
मन के हारे मौत जानो
अब न कोई अपना सूझे
जो मिले उसे अपना मानो
जो मिले उसे…………………

आँसु टपका आँख से उसकी
और वो बोली व्याकुल मन से
वायदा किया था जीवन दूंगा
मौत का अहसास दिया
मौत का अहसास……………

चन्द लम्हे अब शेष बचे हैं
कैसे कटेंगे मैं तो न जानूं
अपना पराया समझ न आये
अब किसे मैं अपना मानूं
अब किसे मै…………………..

तेल खत्म है, बुझने को बाती
कैसा यह तूनें सन्ताप दिया
इस दुनियां से उस दुनियां को
एक अनूठा अभिशाप दिया
एक अनूठा…. …. …………….

क्या करुं अब जाऊँ कहां मैं
जीने की कोई चाह नहीं
अधेरी गलियां कदम बहकते
कोई साफ सुथरी राह नहीं
कोई साफ सुथरी…………… ….

चीख उठी फिर दर्द के मारे
और बह बोली आँख मूंदे
सुनो “निराश” मर्जी तुम्हारी
मुझको अंतिम श्वास दिया
मुझको अंतिम………………….

मैंने तुझ पर जीवन बारा
तूने यह कैसा साथ दिया
क्यूं उजाड़ा यौवन मेरा
टूटा हुआ विश्वास दिया
टूटा हुआ……………….

सुरेश भारद्वाज निराश
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