पर्यावरण संरक्षण में हिमाचल के सराहनीय कदम/आशीष बहल

Say No To Thermocol and Save Environment

पर्यावरण संरक्षण की ओर हिमाचल सरकार के सराहनीय कदम

आज पर्यावरण संरक्षण और उसमें बढ़ता प्रदूषण चिंता का विषय है। पिछले कुछ सालों में पर्यावरण में हुए बदलावों को हम महसूस कर रहे हैं। पर्यावरण संरक्षण के लिए सभी देश चिंतित भी है और इसके दुष्परिणाम भविष्य में और बढ़ जाएंगे इसमे कोई शक नही। समाज का हर वर्ग पर्यावरण संरक्षण हेतु कई अभियान शुरू करता आया है क्योंकि ये एक ऐसा विषय है जिसे कभी भी हल्के में नही लिया जा सकता। और पर्यावरण प्रदूषण का संकट पैदा भी तो मनुष्य ने ही किया है तो अब इसके दुष्परिणाम भी मनुष्य को ही उठाने पड़ेंगे। मनुष्य ने अपने जीवन को सुगम बनाने के लिए प्रकृति के साथ खिलवाड़ करता आया है। प्रकृति से हमे जितना कुछ मिला है हमने उस उपकार के बदले प्रकृति को हानि पंहुचाई है। हम आज पर्यावरण के बारे में लंबी चौड़ी बातें करते हैं और कोई सकारात्मक कदम उठाने में हमेशा पीछे हटते हैं। परन्तु ये हम सबके लिए एक गर्व का विषय है कि हिमाचल प्रदेश एक ऐसा राज्य है जो पर्यावरण संरक्षण के प्रति हमेशा ही आगे रहा है और हिमाचल ने आगे आकर पर्यावरण संरक्षण का सन्देश देश और दुनिया को दिया है। हिमाचल में प्रकृति ने अपनी बेहद खूबसूरत छटा बिखेरी है। यही कारण है कि हिमाचल में प्रकृति के प्रति हमेशा प्रेम रहा है हिमाचल ने पहले भी पर्यावरण के लिए हानिकारक माने जाने वाले पॉलीथिन को बंद किया था। लगभग 15 साल पहले 2003 में हिमाचल पॉलीथिन बन्द करने वाला देश का पहला राज्य बना था। अब हिमाचल सरकार ने 5 जून को पर्यावरण दिवस पर थर्मोकोल बन्द करने की सार्थक पहल दोनो ही बातें चाहे वो पॉलीथिन प्रतिबन्ध हो या थर्मोकोल प्रतिबन्ध प्रशंसा के योग्य है। हम आज के इस आधुनिक युग मे हम देखते हैं कि मनुष्य अपनी ज़िंदगी को अधिक से अधिक सुगम बनाने में लगा है कि कई अप्राकृतिक कृत्य कर बैठता है। परन्तु इस सरल जीवन की चाहत में हम ये भूल जाते हैं कि ये सरलता हमारे लिए हानिकारक भी है।

थर्मोकोल को पर्यावरण के लिए बहुत हानिकारक माना जाता है। ये सेहत के लिए तो नुकसान दायक है ही साथ ही भूमि में मिलकर भूमि की उपजाऊ शक्ति को भी कम करता है। एक मेडिकल सर्वे के अनुसार थर्मोकोल मनुष्य के जीवन मे जहर घोल रहा है। थर्मोकोल के डिस्पोजल प्रयोग करने से पेट, आंत, गले पर बहुत बुरा प्रभाव डालता है इससे कई बीमारियों के होने की आशंका बढ़ती है यंहा तक कि कैंसर जैसे गंभीर व जानलेवा रोगों का भी कारण बनता है।इसके साथ ही ये भूमि में मिलकर गलता सड़ता नही ही जिसके कारण भूमिगत जल पर भी नाकारात्मक प्रभाव पड़ता है। और यही कारण है कि जल की समस्या भी दिन प्रतिदिन बढ़ रही है। हम अपने थोड़े से लाभ के लिए अपना ओर प्रकृति का भरपूर नुकसान करते हैं। आजकल के इस आधुनिक युग मे डिस्पोजल का प्रयोग बहुत बढ़ गया है और हमारे दैनिक जीवन मे हर कार्य मे डिस्पोजल प्लेट, ग्लास, कटोरी का प्रयोग होता है जो कि जगह जगह कूड़े के रूप धारण कर लेता है। अभी तो मात्र थर्मोकोल से बने डिस्पोजल को ही बंद करने का फैंसला हिमाचल सरकार ने लिया है परन्तु यदि हम सब चाहें तो इसे पूरी तरह बंद करके स्वरोजगार की प्राचीन पद्धति को आगे बढ़ा सकते हैं। आजकल के इस डिस्पोजल युग मे प्राचीन समय से प्रयोग होती आ रही पत्तल की मांग बहुत कम हो गयी है। हम अक्सर अपने बड़े बुजुर्गों को कहते हुए सुनते हैं कि धाम का असली मजा तो पत्तल ने ही आता है परन्तु आजकल की पीढ़ी इस मजे से अनभिज्ञ है क्योंकि थर्मोकोल से बनी पत्तलों ने उस मजे पर ग्रहण लगा दिया है। जो लोग इस प्रकार पत्तल बनाने के कार्य से जुड़े थे वो भी अपने इस पारम्परिक कार्य को बंद कर बैठे हैं क्योंकि आजकल समाज मे कागज ओर थर्मोकोल से बनी पतले इत्यादि अधिक चलती है।

हिमाचल जिसे प्रकृति ने बहुत सी वन सम्पदायें उपहार के रूप में दी है उसी में से एक है पत्तल तैयार करने का पारम्परिक कार्य। सामान्यतः पिछड़ी जाति के लोग इस व्यवसाय को चलाते आए हैं वही पत्तल बनाने का काम बड़ी ही लग्न और हुनर के साथ करते थे जिससे सभी वर्ग के लोगों में आपसी बातचीत और सौहार्द पूर्ण वातावरण रहता था। एक दूजे के काम आकर समाज मे सामुदायिक हिस्सेदारी की अदभुत मिसाल मिलती थी। ऐसे पारम्परिक हुनर पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ते रहें तो समाज मे आपसी भाई चारे के भी वातावरण बना रहता है। इसलिए हिमाचल सरकार द्वारा थर्मोकोल डिस्पोजल पर प्रतिबन्ध लगाकर जंहा पर्यावरण संरक्षण का सन्देश दिया है वंही प्राचीन पत्तल बनाने के हुनर को भी संजीवनी का काम किया है। अब पर्यावरण संरक्षण का दोहरा कार्य हो सकता है एक तो पर्यावरण संरक्षण का कार्य भी पूरा होगा साथ ही पारम्परिक हुनर से जुड़े परिवार भी पत्तल बनाने वाले पेड़ों की रक्षा करेंगे तथा और पेड़ लगाने में भी आगे आएंगे ये माननीय मुख्यमंत्री महोदय की दूरगामी सोच को भी बताता है।

आज हिमाचल प्रदेश सरकार ने एक ओर सार्थक पहल की है और पर्यावरण संरक्षण के प्रति अपनी वचनबद्धता को साबित करते हुए ये एतिहासिक फैंसला लिया है। इस फैंसले से जंहा एक ओर पत्तल इत्यादि बनाने वाले परिवारों में एक नई आशा की किरण पैदा हुई है। पत्तल का प्रयोग जंहा एक और ग्रामीण रोजगार के अवसर पैदा करता है वंही इसका प्रयोग के बाद बचने वाले अवशिष्ट को भी खाद इत्यादि बनाकर प्रयोग किया जा सकता है। क्योंकि ये घास पत्तो की बनी होती है इसलिए कागज और थर्मोकोल के मुकाबले कंही अधिक जल्दी गल सड़ कर खाद का रूप धारण कर लेती है। साथ ही पशुओं के लिए चारे के रूप में इसका प्रयोग हो सकता है तो इस प्रकार अगर व सम्भव इसमे कोई शक नही और हिमाचल की जनता हमेशा ही पर्यावरण संरक्षण के प्रति अपनी जिम्मेदारी को बखूबी निभाता आया है इसमें कोई दो राय नही इसका सबसे बड़ा उदाहरण पॉलीथिन बन्द करना था। पॉलीथिन एक समय मे हर घर की आवश्यकता थी कोई भी बिना पॉलीथिन के जिंदगी की कल्पना नही कर सकता था। परन्तु हिमाचल की समझदार जनता ने इस अभियान का न सिर्फ समर्थन किया था बल्कि हिमाचल को पहला पॉलीथिन मुक्त राज्य घोषित करवा दिया था। और ये बात पूरे भारत वर्ष के लोगो मे चर्चा का विषय थी कि वँहा के लोग अपना सामान बगैरा किस तरह उठाते होंगे। तब हिमाचल की जनता ने उन गरीब लोगों के लिए रोजगार पैदा करवाया था जो कागज के लिफाफे बनाकर अपने परिवार का भरण पोषण करते थे। और आज फिर हिमाचल की जनता थर्मोकोल बन्द करने के फैंसले का स्वागत कर रही है ये हिमाचल के लिए गर्व के विषय है और हिमाचल के लोगो के सहयोग का सबसे बढ़िया उदाहरण।


हिमाचल सरकार ने सिर्फ थर्मोकोल प्रतिबन्ध का ही कदम नही उठाया है इसके अलावा भी पर्यावरण संरक्षण हेतु कुछ महत्वपूर्ण फैंसले लिए हैं जिसमें अब सामान्य कार्यक्रमों इत्यादि में छोटी प्लास्टिक की बोतल अब वैन कर दी गयी है। साथ ही स्कूल जाने वाले बच्चों को भी पीने के पानी की स्टील की बोतल उपलब्ध करवाने की सरकार की योजना है। पर्यावरण संरक्षण हेतु पेड़ लगाने का अभियान युद्ध स्तर पर शुरू किया जा रहा है। जिसमे एक महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट है ” पापा ” पॉल्युशन अबेटिंग प्लांट अभियान के तहत हिमाचल सरकार ने ऐसे पौधे लगाने का काम शुरू किया है जिससे पर्यावरण के खतरे को कम किया जा सकता है। जन भागीदारी से शुरू इस कार्य को प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की देख रेख में किया जाएगा। जिसमे ऐसे क्षेत्र जंहा पर्यावरण प्रदूषण बढ़ रहा है वँहा इन पौधों को लगाया जाएगा। जो अपने आप मे किसी भी सरकार के द्वारा उठाया गया एक सराहनीय कदम है। अगर हम आने वाले खतरे के प्रति आज सचेत नही होंगे तो आने वाला अंधकार मय होगा। और हर सरकार को कुछ ऐसे फैंसले और अभियान शुरू करने चाहिए जो राजनीति से ऊपर उठकर समाजहित के लिए उपयोगी हो।

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अगर हम आने वाली पीढ़ी के लिए प्राकृतिक संसाधन जैसे शुद्ध जल, ताजी हवा, स्वच्छ पर्यावरण बचा पाए तो शायद यही उनके लिए सबसे बड़ा उपहार होगा। तो आइए मिलकर पर्यावरण संरक्षण के प्रति अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करते हुए अपने आप से जितना पर्यावरण संरक्षण का कार्य हो सके उसे जरूर पूरा करें। अगर हम पर्यावरण संरक्षण नही कर सकते तो कम से कम उसे दूषित करने में भी भागीदार न बनें। जब देश का हर नागरिक अपनी जिम्मेदारी को समझेगा तो हमे दूसरों को सुधारने की आवश्यकता नही पड़ेगी क्योंकि आप भले तो जग भला। आईये समय की इस पुकार को सुने और इस फैंसले का स्वागत करते हुए थर्मोकोल के साथ साथ अन्य डिस्पोजल के प्रयोग को बंद करें।

आशीष बहल

Ashish Behal
Writer

चुवाड़ी जिला चम्बा

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