नाई परिवार के लोग निभाते है अहम भूमिका
हिमाचल यानि संस्कृति, पर्व ओर त्यौहार जिसके रोम रोम में बसते हैं। इन्ही त्योहारों में से एक अश्वनी माह की सक्रांति को मनाया जाने वाला सैर या सायर का त्यौहार भारत के विभिन्न हिस्सों में मनाया जाता है। सैर हिमाचल के कांगड़ा, मंडी, पालमपुर,हमीरपुर,सोलन इत्यादि में बहुत प्रसिद्ध है।

सैर की सक्रांति में लोग अपने घरों में तरह तरह के पकवान बनाते हैं तथा घरों में पूजा करते हैं।
नाई समुदाय के लोग इस शुभकार्य में अहम भूमिका निभाते हैं। रात के समय नाई परिवार के सदस्य एक टोकरी में सैर माता की प्रतिमा लेकर लोगो के घरों में जाते हैं और सभी परिवार अपनी नई फसल मक्की, अमरूद, ककड़ी, फल, इत्यादि माता को अर्पण करते हैं।

क्या आप जानते हैं कि नाई परिवार क्यों निभाता है ये रस्म
बरसात के बाद मनाया जाने वाला ये पवित्र त्यौहार धार्मिक और सामाजिक दृष्टि से भी काफी महत्वपूर्ण है।
कहते हैं पुराने समय मे राजा के आदेश से ये परम्परा शुरू हुई। अब कौन से राजा थे ये तो जानकारी नही है पर जो जानकारी बुजुर्गों से प्राप्त हुई वही सांझा कर रहा हूँ।
पुराने समय मे संचार के या यातायात के कोई साधन नही होते थे। तो जब भारी बरसात से कई इलाकों में बहुत नुकसान हो जाता था और कई लोग पानी मे वह जाते थे तो उनके रिश्तेदार ओर भाई बन्धुओ को इसकी जानकारी नही होती थी। तो राजा ने ये कार्य अपने राज दरबार के नाई को सौंपा। नाई पूरे गाँव मे लोगो के घरों में उनका कुशल क्षेम पता करता और परिवार के सदस्यों में किसी के साथ कोई अप्रिय घटना तो नही घटी या कोई खुशी की बात का पता लगाता। ये जानकारी वो दूसरे गांव के नाई के साथ सांझा करता। इस तरह राजा को अपने राज्य की पूरी जानकारी मिल जाती। लोगों के घरों से जो दान स्वरूप मिलता वही नाई का मेहनताना होता। इस तरह सैर का पर्व प्रसिद्ध हुआ।
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लोग बरसात के मौसम के बीत जाने पर खुशी व्यक्त करते और भरपूर बारिश और अच्छी फसल के लिए भगवान का आभार जताते ।

सज्जा साजि या सक्रांति कहा जाता है।
इस तरह ये त्यौहार हमारे आम जन मानस में काफी लोकप्रिय हुआ और आज सब घरों में इस त्यौहार को खुशी खुशी मनाते हैं।

लेखक

आशीष बहल


आशीष बहल
चुवाड़ी जिला चम्बा
Ph 9736296410

पढ़िए ये सुंदर कविता डॉ कटोच जी की

सैर (त्योहार)

अम्बर पिया गड़ोड़ेयां,

लोक खान पतरोड़ियां ।

कदी घीये पेठेयां कदी,

करेलियां खादे कोड़ियां ।

खाई खाई दिल अक्की जायें

खादे माह् दे तली पकोड़ियां ।

मरूदां खाई खेली खोड़ां,

कईयां चोरिया छलियां तोड़िया ।

घीये पेट्ठे लगियो भतेर ,

काकडियां लगियां थोड़ियां ।

काला महीना मुकी गिया,

लगी पईयां मिलणां जोड़ियां ।

गर्मियां हुण चली पईयां ,

सर्दियां हनं बत्ता दोड़ियां ।

नेडें आईयो ‘कुशल’ ‘सैर’,

‘’ रोटियां खानियों थोड़िया ।

  

     डा. कुशल कटोच

लोअर वडोल दाडी

धर्मशाला ।

9418079700