रेणुका देवी का है हिमाचल से गहरा नाता “रेणुका यात्रा”/युद्धवीर

रेणुका देवी का है हिमाचल से गहरा नाता “रेणुका संस्मरण यात्रा”

मायें नी मेरिये शिमले दी राहें ‘सिरमौर भी उतनी ही दूर’

सिरमौर जिला के एक प्रसिद्ध गायक मोहित चौहान जी ने अपने गीत (मायें नी मेरिये शिमले दी राहें चम्बा कितनी की दूर) में चम्बा में आने और बसने की बात कही है| सम्भवतः यह गीत आज चम्बा की एक पहचान बन चुका है| भौगोलिक दृष्टि से देखें तब भी प्रदेश के एक कौने में अगर चम्बा है दुसरे कौने में सिरमौर| इसी गीत में जिक्र इस दूरी का भी है लेकिन यह दूरी दोनों तरफ से एक समान है यानि (मायें नी मेरिये शिमले दी राहें सिरमौर भी उतनी ही दूर)|


अक्सर सोचता था की कब और कैसे अवसर मिलेगा इस दूरी को पाटने का और कई बार अवसर आये भी जाना सम्भव न हो पाया| लेकिन कहते हैं ना कि जब वक्त आता है तो कोई बहाना कोई रोड़ा आपके और आपकी मंजिल के बीच नहीं आ पाता कुछ ऐसा ही हुआ जब मुझे फ़ोन आया श्री संदीप भट्ट जी का वो अपनी बात कहते जा रहे थे और जबाब में बस हाँ ही प्रत्युतर में मेरे मुख से निकलता जा रहा था| फिर बात हुई श्री शिशुपाल जी से और बस ऐसा लगा की अब तो सिरमौर मुझे कह रहा है ‘अब तो आ ही जाओ’ मुझे भी लगा की इससे अच्छा कारण और समय नहीं हो सकता सिरमौर और चम्बा की दूरी को पाटने का| अवसर था चार दिवसीय राज्य स्तरीय कार्यशाला ‘एक प्रयास’ में बच्चों को पढ़ाने के गुर सिखने के लिए जाने का|

मैंने अपनी यात्रा 7 जनवरी 2018 को अपने घर तेलका से सुबह 7 बजे आरम्भ की अब चूंकि टिकट रात्रि 7:30 की मिली तो बीच के समय का सदुपयोग करने मैं अपने आदर्श श्री विपिन चंद राठौर जी के घर गया जहाँ से हमेशा की ही तरह मुझे बहुत सकारात्मक ऊर्जा मिली| फिर ओबड़ी स्थित अपने भाई के प्रकोष्ठ से मैं चम्बा बस अड्डे की तरफ चल पड़ा| वहाँ से रात्रि 7:30 पर हिमाचल पथ परिवहन निगम की बस से अपनी आगे की चम्बा से कुम्हार हट्टी तक की यात्रा आरम्भ की| यात्रा मंगलमय रही और अगले दिन सुबह करीब 7:30 पर ही मैं कुम्हार हट्टी पहुंच गया इस दौरान श्री शिशुपाल की पल पल सम्पर्क साधे हुए थे| वहाँ कुछ देर के इंतजार के पश्चात नैना टिक्कर (कार्यशाल के स्थान) के लिए राजधानी बस मिली और ठीक 9:30 पर 8 जनवरी की सुबह मैं सिरमौर में था| वहाँ पहुंचते ही शिशुपाल जी से भेंट हुई और वो मझे ले कर अपने प्रकोष्ठ को और चल दिए| वहाँ नित्य कर्म से निपट कर नाश्ता किया और फिर जुट गये कार्यशाला की तैयारियों में| चार दिन कैसे बीत गये पता ही नहीं चला मैं तो ये कहूँगा की पुरे वर्ष भर के लिए बैट्री चार्ज हो गयी अब इतना कुछ था करने को पाठशाला में और कक्षा कक्ष में की लगता है कहीं स्त्र कम न पड़ जाये|

लगभग 6 जिलों के सर्वश्रेष्ठ अध्यापकों के साथ प्रत्यक्ष अनुभव और उनके नवाचारों को आत्मसात करने का अवसर सच में यह एक अद्वितीय अनुभव रहा| इतने दिन एक साथ बिताये तो सभी साथियों के साथ घनिष्ठता पूर्वक सम्बन्ध स्थापित हो चुके थे| कहते हैं जब घनिष्ठता बढ़ती है तो दूरियाँ भी मिट जाती हैं और घर कर जाता है तो अपनत्व का भाव| श्री राजेश जी और श्री नीरज रमौल जी ये दो ऐसे नाम हैं जिन्होंने सिरमौर को मेरे लिए मेरा दूसरा घर बना दिया है और मेरे जीवन में जब कभी भी सिरमौर का जिक्र होगा तो ज़हन में बाकी सभी अध्यापक साथियों के साथ साथ जिनका सबसे अधिक ख्याल आयेगा वो है श्री राजेश जी और श्री नीरज रमौल जी|

इतनी जानकारी शायद किताबें पढ़ के भी मुझे सिरमौर के बारे में नहीं मिल पाती जितनी की श्री राजेश जी और श्री नीरज रमौल जी के सानिध्य में मुझे मिली है| जहाँ भी गये वहाँ का सम्पूर्ण ब्यौरा इन्होनें मुझे बताया वास्तव में यह इनका स्नेह था जो इन्होने इतने कम समय में इतनी ज्यादा जानकारी देशाटन और तीर्थाटन के माध्यम से मुझे प्रदान की| जितनी ही मेरी उत्सुकता थी सिरमौर को जानने की उतना ही इसे इन्होने शांत किया| हर स्थान को उसके विभिन्न विभिन्न सन्दर्भों और कहानियों के माध्यम से बताने की कला का मैं भी कायल हो गया| इस सम्पूर्ण यात्रा में मुझे जो भी जानकारी मिली उस सब को आप के सामने इस संक्षिप्त यात्रा वृतांत के माध्यम से रखने का प्रयास करूंगा|

तो 12 जनवरी 2018 को कार्यशाला के विधिवत समापन के पश्चात करीब करीब 2 बजे हम नैना टिक्कर से रेणुका जी के लिए निकले| राजेश जी रास्ते में आने वाले हर खास स्थान के बारे में बताते हुए चल रहे थे| सबसे पहले सराहां जो की नैना टिक्कर से 17 कि.मी. था पहुंचे और यहीं हमने यह निश्चय किया की हम रेणुका जी के दर्शन अगले दिन तसल्ली से करेंगे| फिर 33 कि.मी. आगे रेणुका दो सड़का (यह नाहन से 10 कि.मी. पीछे है) और 26 कि.मी. की और यात्रा करके ददाहू पहुंचे| बीच में हमने एक प्राचीन किला ‘जैतक किला’ भी देखा यह एक अच्छा स्थान था लेकिन अब यह किसी की रिहाइश है अतः यहाँ पर अंदर जा कर कुछ हम नहीं देख पाए लेकिन फिर भी हमने वहाँ पर अल्पाहार किया और कुछ फुर्सत के पल भी बिताये| तत्पश्चात घुमने के उद्देश से कच्चे रास्ते से होते हुए हमने ददाहू का रुख किया| रास्ते में जहाँ लोगों के पारम्परिक घर देखने को मिले, उनके खेत देखने को मिले तो वहीं उनकी जीवन शैली के भी कुछ अंश भी इस दौरान दृष्टिगोचर हुए| तो कुछ यूँ कच्चे पक्के रास्तों से होते हुए हम पहुंच ही गये ददाहू|
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ददाहू के बारे में यही कहना चाहता हूँ की एक छोटा सा कस्बा जो की सैन धार, धारटी धार और गिरी पार से घिरा हुआ है| साथ ही यह इन तीनों का केंद्र स्थल भी है यानि एक समय में यह इन तीनों जगह के लोगों के लिए सामान्य मिलन स्थली थी| अब तो जगह जगह लोगों द्वारा अपनी छोटी छोटी दुकानें खोल ली गयी हैं लेकिन फिर भी इसका महत्त्व आज भी कम नहीं हुआ है| गिरी, जलाल और सरस्वती नदियों की त्रिवेणी भी यहाँ से दृष्टिगोचर होती है| यहाँ के लोग बड़े सरल सहज एवं मिलनसार स्वभाव के हैं| यहाँ पर तहसील कार्यालय, स्कूल और अस्पताल जैसी मूलभूत सुविधाएँ उपलब्ध हैं|
यहीं ददाहू में श्री राजेश जी का एक सुंदर का घर स्थित है जहाँ दो दिन का प्रवास मुझे श्री नीरज रमौल जी के साथ करने का सुअवसर प्राप्त हुआ| रेणुका जी जाने से पहले हम यहीं ठहरे और श्री राजेश जी के परिवार के अतिथि सत्कार के साक्षी बने| यहाँ जा कर अतिथि देवो भवः के सांस्कृतिक मूल्यों की जीती जागती मिसाल मुझे देखने को मिली| सबसे अधिक प्रभावित करने वाली बात थी बच्चों के संस्कार और परवरिश जिसका कारण उनका संयुक्त पारिवारिक परिवेश हो सकता है| जिसमें उन्हें हर किसी की अच्छी बातें और आशीष एक साथ मिलता है| घर पहुंचे जो साँझ हो चुकी थी तो कुछ पल विश्राम पर हम बाजार के भ्रमण पर निकल पड़े| लगभग हर दुकानदार से श्री राजेश जी ने परिचय करवाया और छोटी बड़ी बातें बताते हुए गिरी पूल की तरफ चल पड़े| यहाँ जिक्र हुआ माँ भंगाय्नी जी का तो श्री राजेश जी ने चलते चलते उनकी कहानी हमें सुनाई जिसे मैं आप सब से भी साँझा कर रहा हूँ|

एक बार की बात है शिरगुल महाराज जी किसी प्रसंग से दिल्ली गये हुए थे तो उन्हें वहाँ पर चमड़े की बेड़ियों में बंदी बना लिया गया| चमड़े में जकड़े होने के कारण उनकी दैवीय शक्ति क्षीण हो गयी और वह उस बंधन से मुक्त न हो पाए| ऐसे में वहाँ पर सफाई का कार्य करने वाली एक स्त्री (जिन्हें भंगी भी कहते हैं) से शिरगुल महाराज ने उन्हें बेड़ियों से मुक्त करने की बात कही| उन्होंने कहा की ऐसा करने पर आप तो चले जायेंगे लेकिन मुझे पीछे से ये नहीं छोड़ेंगे और मेरे प्राणों को भी खतरा होगा| शिरगुल महाराज जे ने उन्हें वचन दिया की आप को मैं यहाँ नहीं रहने दूंगा और अपने साथ ले जाऊंगा| उस स्त्री ने आश्वस्त हो कर जैसे ही उन्हें बेड़ियों से आजाद किया वचन अनुसार वे उन्हें लेकर सिरमौर के उस स्थान पर आ गये जहाँ वर्तमान में माता भंगायनी जी का सुंदर मन्दिर विराजमान है| शिरगुल महाराज जी ने कहा की जहाँ तक भी आप की नजर जा रही है आप क्षेत्र की कुल देवी के रूप में पूजी जाएँगी| तब से इस क्षेत्र में माता की स्थानीय लोग बड़ी आस्था से पूजा करते हैं| और माता भी अपने भगतों की हर परिस्थिति में सहायता करती हैं|

इस सुंदर कहानी के बखान के साथ ही हम वापिस घर भी पहुंच गये| घर पहुंच कर श्री राजेश जी के बच्चों संग कार्यशाला की तस्वीरों को देखने का आनदं लिया| काफी थके होने के कारण बातें करते करते ही नींद कोमल पलकों पर भार डालने लगी और जैसे ही पलकें इस खुबसूरत बोझ से झुकने लगीं पता ही नहीं चला कब नींद पड़ गयी| प्रातः मेरे फोन का 5:30 का अलार्म बज उठा और पुनः आगे की हमारी दिनचर्या शुरू हो गयी| सुबह नाश्ते में हमें सिरमौर का पारम्परिक व्यंजन असकली खाने का सौभाग्य मिला| यह बड़ा ही लजीज व्यंजन है और इसे खाने से कोई भी खाने का शौकीन (मेरी तरह) अपने आप को रोक ही नहीं सकता| इसके साथ ही हमने आनन्द लिया स्वादिष्ट नाल बड़ी खाने का जो की सिरमौर जिला का एक अन्य लाजबाब व्यंजन है| शानदार सुबह का दमदार नाश्ता समाप्त करते ही हम निकल पड़े अपने अगले पड़ाव माता रेणुका की और लेकिन इससे पहले हम जलाल पुल को पार कर श्री राजेश जी के दुसरे घर में गये वहाँ पर इनके अग्रज से मुलाकात हुई| यहीं पर हमने आगे के रोमांचक सफर के लिए अपनी सवारी बदली|

अब सवारी बदलने के साथ साथ ही एक नये साथी श्री हेमंत जी (श्री राजेश जी के अग्रज के बेटे) भी हमारे साथ आगे के सफर के लिए हो लिए| फिर ददाहू से 2 कि.मी. आगे हम गिरी पुल को पार करते हुए रेणुका झील के पास पहुंच गये| लेकिन हम सब ने निश्चय किया की झील के दर्शन व परिक्रमा से पूर्व हम ऋषि जमदग्नि जी के आश्रम उनकी तपोस्थली टोपे का टीला के दर्शन करेंगे| रेणुका झील से लगभग 21 कि.मी. का यह सारा का सारा ट्रेक है जिसमें पहले 3 कि.मी. की दुरी के पश्चात कह्लाकयार नामक जगह आती है जहाँ से बंयाँ मोड़ लेकर 4 कि.मी. खरड (जम्मू गावं) आता है और वहाँ से दायाँ मोड़ लेकर सीधे ऋषि जमदग्नि जी के आश्रम तक पहुंचा जा सकता है| सफर कच्ची सड़क से होकर तय करना पड़ता है लेकिन रोमांच से भरपूर है| यहीं रास्ते से आपको रेणुका झील एक सोयी हुई स्त्री के समान लगती है यहाँ का विहंगम दृश्य मन पर गहरा प्रभाव छोड़ता है और अगर धुंध न हो तब तो क्या बात ऐसे लगता है मानों माँ रेणुका के साक्षात दर्शन हो रहे हों| रेणुका झील एक वन्य जीव अभ्यारण है अतः यहाँ पर किसी भी प्रकार की रिहाइश नहीं है लेकिन इससे आगे बढ़ते जाएँ तो बीच में कई छोटे छोटे गावं आते हैं|
इस पुरे क्षेत्र में जिस बात ने मुझे अपना कायल बना लिया वो थी यहाँ के बड़ों द्वारा अपने बच्चों को दिए जा रहे संस्कार| यहाँ के बच्चे अपने से बड़े हर व्यक्ति को चाहे वो परिचित हों या अनजान प्रणाम करना नहीं भूलते जितने व्यक्ति होंगे उतनी बार यहाँ के बच्चे उन्हें झुक कर प्रणाम करेंगे| इस तरह के संस्कार शहरों में सहजता से दखने कोनहीं मिलते| भारत की पुरातन संस्कृति को सहेजने का और संवर्धित करने का जो पुनीत कार्य गिरी पार के इस पुरे क्षेत्र में हो रहा है यह समस्त भारत के लिए एक सबक से कम नहीं हैं|
इसके अतिरिक एक और अद्भुत बात थी जो की मार्ग में अलग लगी वो थी यहाँ पाई जाने वाली सफेद मिट्टी जिसे यहाँ के स्थानीय लोग गृह निर्माण में रेत के रूप में प्रयोग करते हैं और कच्चे घरों में इस मिट्टी से लिपाई पुताई का कार्य भी होता है| इस मिट्टी को भी यहाँ की दंत कथाओं में आस्था से जोद्फ़ जाता है पर खा जाता है की यह मिटटी ऋषि जमदग्नि जी के धोउने (धूणी/हवन)की मिटटी है जिसे माता रेणुका हर सुबह निकाल कर फेंकती थी|
देखते ही देखते और बातें करते करते कब हम आश्रम (ऋषि जमदग्नि की त्पोस्थली) पर जा पहुंचे हमें पता ही नहीं चला| गाड़ी से उतर कर बमुश्किल 5 मिनट के सफर के बाद आ गया वो स्थान जहाँ पर माता रेणुका अपने पति ऋषि जमदग्नि जी के साथ रहती थीं| एक छोटा सा मन्दिर जिसमें शान्ति ही शान्ति चारों तरफ आपको महसूस हो रही थी| मेरा दिमाक कल्पना करने लगा की कैसे यह तपोस्थली किसी समय में मंत्रोचार से गुंजित होती होगी| मैं इस महान तपोस्थली के दर्शन कर खुद को भाग्यशाली समझता हूँ| वहाँ हम कुछ पल रुके और प्रकृति की इस अथाह खूबसूरती को अपने अपने कैमरे में कैद करने का प्रयत्न करने लगे लेकिन मनो की प्रकृति भी बाहें फैलाये कहे जा रही हो ‘तु खिंच मेरी फोटो’

इसके बाद श्री राजेश जी ने इस तपो स्थली से जुड़ी दंत कथा सुनाई जो की बड़ी ही रोचक व भक्ति भाव एवं शिक्षा से पूर्ण थी मैं यहाँ वो कथा आप सब को भी सुनना चाहूँगा| माता रेणुका राजा सहस्त्रबाहु की दो पुत्रियों में से एक थीं| उनकी दूसरी पुत्री का विवाह एक शक्ति शाली राजा के साथ हुआ था| माता रेणुका ख़ुशी ख़ुशी ऋषि की सेवा और अन्य दैनिक कार्यों में अपना जीवन व्यतीत कर रही थी| वे रोज सुबह गिरी नदी, जलाल नदी और सरस्वती नदी की त्रिवेणी पर जा कर शुद्ध एवं ताजा जल पूजा हेतु लाया करती थी| हर रोज की ही तरह वह एक दिन कच्ची मिट्टी से घड़ा बना कर पानी लाने हेतु त्रिवेणी पर गयी हुई थी| उस समय उनकी बहन का पति भी वहाँ पर आया था| वो नीच माता पर मोहित हो उन्हें अपने साथ रहने हेतु उकसाने लगा लेकिन माता ने बड़ी शालीनता से उसको जबाब दिया| इसी बीच माता को जल लेकर जाने मन देरी हो गयी और विचलित होने के चलते घड़ा भी नहीं बन पाया| ऋषि ने जब देरी का कारण पूछा तो माता में सारी बात उन्हें बता दी की कैसे उस रजा ने उन्हें यह कहा की उसके पास सब कुछ है और क्यों वो गरीबी का जीवन काट रही है| इस पर ऋषि ने माता रेणुका से राजा को भोजन हेतु आमंत्रित करने की बात कही| राजा ऋषि को नीच दिखाने के लिए अपनी सारी सेना के साथ जा पहुंचा| उधर ऋषि ने इंद्र देव का अहवाह्न कर उनसे कुछ समय के लिए उनकी गाय (कामधेनु) मांग ली थी| इसी गाय की करामत से राजा और उसके सैनिक खाना खाते गये लेकिन भोजन खत्म न हुआ| और तो और जितनी बार माता रेणुका भोजन परोसने के लिए वहां जाती उनके तन पर हर बार एक नया ही वस्त्र होता यह सब देख राज चकित हो उठा और सोचने लगा की ऋषि के पास इतनी अधिक पत्नियां हैं और इतनी अधिक सम्पदा| लेकिन उसके नाइ ने उन्हें बताया की यह अलग अलग स्त्री नहीं बल्कि एक ही है औरये सब कुछ ऋषि की गायु के कारन हो रहा तब राजा ने ऋषि से उनकी गाय मांग ली लेकिन ऋषि ने ये कह कर की ये उनकी नहीं बल्कि इंद्र देव की अमानत है दने से मना कर दिया| राजा हठी और दुष्ट था वो भी नहीं माना उसने गाय के लिए युद्ध छेड़ दिया ऋषि ने काफी समय तक उसका सामना किया लकिन अंत मेंराज ने ऋषि की हत्या कर दी| लेकिन इससे हले ही ऋषि ने गाय को वापिस भेज दिया था| अब राजा के मन में एक और दुष्ट विचार आया उसने सोचा की क्यों न अब माता रेणुका को अपने साथ ले जाया जाये लकिन इससे पहले की वह माता को छु भी पाता माता ने छलांग लगा दी और और झील में समा गयी तभी से इसका आकर सोई हुई स्त्री की तरह हो गया है| स्थानीय लोग इसे माता का स्वरूप मानते हैं यही कारन है की आज भी अधिकतर स्थानीय लोग इस पर वोटिंग को सही नहीं मानते और भी इस पर वोटिंग नहीं करते| यह घटना घटित होते ही तपस्या मन लीन भगवान परशुराम जी का ध्यान भंग हो गया वह शीघ्र ही तपे के किले अपने पिता के आश्रम में जा पहुंचे वहाँ के हालात को देख कर उन्हें बहुत क्रोध आया| उसी क्षण उन्होंने क्षत्रियों का नाश और वध करने की प्रतिज्ञा ली व सहस्त्रबाहु और उसके सभी पुत्रों का वध कर दिया| फिर जब उनका क्रोध शान्त हुआ तो उन्होंने माता रेणुका से जाकर जो की उस समय तक सरोवर में समा चुकी थीं पुनः प्रकट होने का आह्वान किया| लेकिन माता ने मना करते हुए कहा की वह वर्ष में केवल एक बार कार्तिक मास की एकादशी को तुमसे मिलने के लिए आउंगी| तभी से यहाँ पर इस अवसर पर एक मेले का आयोजन किया जाता है यह मेला माता रेणुका और उनके पुत्र परशुराम के पवित्र मिलन की याद में मनाया जाता है| इसके अतिरिक्त भी झील में अमावस्या, पूर्णिमा सक्रांति को हजारों श्रद्धालु आकर आस्था की डुबकी लगाते हैं|

इस सुंदर वृतांत को सुनते सुनते हम वापिस आ पहुचे जम्मू गावं में इसे भगवान परशुराम की जन्मस्थली माना जाता है| यहाँ पर भगवान परशुराम जी का एक प्राचीन मन्दिर है और इसी मन्दिर से रेणुका मेले के लिए परशुराम जी की पालकी आती है| यह मन्दिर अपने आप में अद्भुत है लकड़ी और गारे से निर्मित है इसका प्रवेश द्वारा बहुत नींचा है जहाँ से झुक ही अंदर जाया जा सकता है| लकड़ी की सीढीयों को चढने के पश्चात उपर की मंजिल में भगवान का मुख चिन्ह वह अन्य अनेक देवी देवताओं के मुख चिन्ह देखे जा सकते हैं| यहाँ पंडित जी आरती देने के साथ साथ अभिमंत्रित कर के चावल देते है जिसे रक्षा कवच कहा जाता है|

इस प्रकार यहाँ पर भी सुखद दर्शन कर के हम फिर वापिस झील की और चल दिए| रस्ते में जहाँ से झील एक सोयी हुई स्त्री के आकर की लगती है वहाँ पर हम रुके और अल्पाहार किया| फिर कुछ ही देर के बाद हम जा पहुंचे झील के पास| सवर्प्रथम हमने झील की परिक्रमा करनी आरम्भ की यह लगभग 2.5 कि. मी. की परिधि हा जिसे तय करने में हमें 2 घंटे का समय लगा| परिक्रमा करते करते तरह तरह के पक्षी और जंगली जीव हमने वहाँ पर देखे वन्य जीव प्रेमी के लिए यह परिक्रमा बहुत ही सुखदायक और रोमांचक रहती है| हर जीव के पिंजरे के बहार उसके बारे में पूरी जानकरी देते सुचना पट्ट लगे हुए थे| रास्ते में चलते चलते भी बहुत से पक्षी व अन्य जीवों को देखा जा सकता है|
इस वन्य जीव विहार में पाए जाने वाले प्रमुख जीवों व पक्षियों के साधारण एवं वैज्ञानिक नाम इस प्रकार से हैं| लाल मुर्गा (Red Jungle Fowl) Gallus Gallus, कक्कड़ (Indian Munt Jack) Muntiacus Muntjack, काला हिरण/कृष्ण मृग (Black Buck) Antilope Cervicapra, साम्बर (Sambar) Russa Unicolour, काला भालू (Asiatic Black Bear) Ursus Thibetanus, तेंदुआ (Common Lepoard) Panthera Pardus, White breasted Waterhen (Amaurornis phoenicurus), The White Throated Kingfisher (Halcyon smyrnensis) Halkyon wild, The Indian Pond Heron (Ardeola Grayii), Common myna (Acridotheres) और Great Cormorant (Phalacrocorax Carbo)|

झील के परिक्रमा के दौरान हमने इन सभी वन्य जीवों को अपने कैमरे में कैद किया| जगह जगह तस्वीरें खिंची श्री राजेश जी और श्री नीरज रमौल जी ने तो कहा की यह उनका छांया चित्र खिंचवाने का अब तक का एक कीर्तिमान है जो शायद ही कभी अब टूटे| झील की सुन्दरता में ये वन्य प्राणी मानो जैसे की चार चाँद लगा रहे हों| कुछ शर्मा रहे थे कुछ डरा रहे थे तो कुछ बड़े शान से उनको देखने आ रहे लोगों को निहारे जा रहे थे| भालू को देख कर लग रहा था की उसे तो किसी से कुछ लेना देना नहीं वो अपनी धुन में मस्त विचरण किये जा रहा था|

फिर जब परिक्रमा समाप्त ही होने वाली थी तो उस समय एक मात्र मीठे पानी का झरना हमें दिखाई दिया| इस पूरी विशाल झील में साफ़ पानी का एक इकलोता झरना है ज की झील को पानी प्रदान करता है| इसकी आकृति अनुसार ही इसे नाम दिया गया है माता का दूध| इसे माता रेणुका का दूध कहा गया है पानी में रोगों को दूर करने की शक्ति है ऐसा भी स्थानीय लोगों में विश्वास है| मेरा अपना स्वयं का भी यह प्रत्यक्ष अनुभव रहा सच में इस जल में रोगों को दूर करने की शक्ति है| वहाँ विराजमान पंडित जी जिस प्रकार माथे पर तिलक लगते हुए मंत्रोचारण के साथ सभी के मंगल की कामना करते है यह एक अलौकिक अनुभूति होती है| कहते हैं ना माता कभी अपने बच्चों को कष्ट में नहीं देख सकती माँ रेणुका के भी बच्चे जब परिक्रमा पूरी कर थकान महसूस करने लगते है उनके ओंठ सूखने लगते हैं बिन मांगे ही माँ अपने पवित्र शीतल जल (दूध) से सब की प्यास बुझाती है| भारत की हर माँ माता रेणुका जी की ही तरह अपने बच्चों के लिए अपना सर्वस्व नयोछावर करने के लिए तैयार रहती है| उनके हर कष्ट को दूर करने के लिए अपनी पलकें तक उनके लिए उनकी राहों में बिछाये रहती है| मेरा भारत की हर माँ को और एसी पावन भारत भूमि को शत शत प्रणाम एवं नमन|

परिक्रमा समाप्त करने के पश्चात हमें आगे दिखाई पड़ी राम की बावड़ी| यहाँ से आगे रेणुका झील से परशुराम ताल में जल जाता है| यहाँ पर पीने के लिए बावड़ी में शीतल जल मिलता है| साथ में लगे परशुराम ताल की सुन्दरता भी देखते ही बनती है| इसके साथ ही एक विशाल मन्दिर परिसर भव्यमान है जिसकी कांति इसके दर्शन मात्र से ही प्रतिबिम्बित होने लगती है| मन्दिर परिसर में वो शिला आज भी विराजमान है जिस पर बैठ कर भगवान परशुराम तपस्या क्या करते थे| हालाँकि कालान्तर में इस शिला का आकार जरुर छोटा हो गया है| इसके साथ ही स्थित है उनका सुंदर मन्दिर भी है यह शिखर शैली में निर्मित है| इसके अंदर भगवान परशुराम जी की प्रतिमा स्थापित है| इसी मन्दिर परिसर में शिखर शैली में ही निर्मित अन्य मन्दिर माता रेणुका, दशावतार, शिवालय, और माता दुर्गा का मन्दिर है| विष्णु भगवान के दस अवतार माने गये हैं इनमें से परशुराम जी को उनका छठा अवतार पुराणों में दर्शाया गया है| ऋषि जमदग्नि और माता रेणुका के पांच पुत्रों में से सबसे ज्येष्ठ का नाम राम था लेकिन उन्होंने भगवान शिव की कठिन तपस्या से अमोघ शस्त्र परशु प्राप्त किया था| तभी से ही वह परशुराम के रूप में जाने जाने लगे|

दशावतार मन्दिर में आपको भगवान विष्णु के दसों अवतारों की प्रतिमाओं के पावन दर्शन का अवसर मिलता है| पहले अवतार मत्स्य अवतार, दुसरे कच्छ अवतार, तीसरे ब्रम्हा अवतार, चोथे नरसिंह अवतार, पांचवें वावन अवतार, छठे परशुराम अवतार, सातवें राम अवतार, आठवें कृष्ण अवतार, नोवें बुद्ध अवतार व अंतिम दसवें अवतार यज्ञदत्त| इन सभी की प्रतिमाएं इस मन्दिर में स्थापित हैं| अवतार सदैव से ही धर्म की रक्षा व अधर्म का नाश करने के लिए इस धरती पर आते रहे हैं| यह अपने जीवन से सम्पूर्ण मानवता को एक संदेश देकर जाते हैं अपने आचरण से लोगों का पथ प्रदर्शित करते हैं| हमें इनके द्वारा दिए गये संदेशों को सदैव के लिए अपनी स्मृति में संचित कर लेना चाहिए|
इस सब के पश्चात अंत में हमने वहां पर एक छोटा सा पक्षी विहार भी देखा जिसमें शतुरमुर्ग और बतख प्रमुख थीं| बतख मन जहाँ अपनी चोंच को अपने पंखों में छुपा रखा था तो वहीँ शतुरमुर्ग सीना छोड़ा किये वहाँ खड़ा था| मेरे पिता जी को इस पक्षी को देखने की और खास तौर पर इसके अंडे को देखने की लिप्सा थी| तो वहाँ उस समय मुझे लगा की शायद मुझे देखने के बहाने (मैं ऐसा मानता हूँ कि वो हर पल मुझे देख रहे हैं) वह आज इस पक्षी को भी देख रहे होंगे|

फिर कुछ पल हमनें वहीं पास ही में स्थित हिमाचल पर्यटन के होटल में काफी पीते हुए आराम किया| तभी जो श्रीमान हमारे लिए काफी लेकर आये उनसे परिचय करवाते हुए श्री राजेश जी ने कहा की यह टूटी हड्डियों को जोड़ने में महारथ रखते हैं और खास तौर पर रीढ़ की हड्डी की दिक्कत जिसे की सम्भवतः चिकित्सक भ लाइलाज बताते हैं उसे भी ठीक करने का हुनर ये रखते हैं| काफी की चुस्कियों से जैसे ही हमारा प्याला खाली हुआ हम पुनः अपनी सवारी के और चल पड़े| जैसे ही गाड़ी में बैठने वाले थे तो वहीं एक भेल पूरी वाला खड़ा दिख गया फिर क्या था उसके साथ भी सेल्फी ली भेल पूरी का लुत्फ़ लेते लेते और दिन भर की यत्रा पर चर्चा करते करते वापिस घर पहुंच गये| सफर की थकान इतनी ज्यादा हो गयी थी की घर पहुंचते ही जल्दी से खर्राटे मारने का मन कर रहा था| जैसे ही घर पहुंचे तो हमने देखा की लोहड़ी उत्सव की त्यारियां पूरी हो चुकी थी मेरे लिए इतने बड़े सयुंक्त परिवार में लोहड़ी उत्सव मनाने का यह पहला ही अवसर था| सभी अग्नि को रेवड़ियाँ, मूंगफली व अन्य चीजें अर्पित की| इस कार्यक्रम के बाद कुछ समय के विश्राम के पश्चात ही स्वादिष्ट भोजन हमारा इंतजार कर रहा था| हमने जी भर कर भोजन किया और सो गये| सुबह आँखें खुलते ही तैयारी शुरू हो गयी पौंटा साहिब स्थित भव्य गुरुद्वारा की|

यात्रा में मैं, नीरज रमौल जी व राजेश जी का परिवार साथ में थे| हम सभी राजेश जी की गाड़ी में पौंटा साहिब की और निकल पड़े रास्ते में जो भी स्थान आये उनका विवरण देते हुए राजेश जी पुनः एक गाइड की भूमिका में आ गये और मैं एक खोजी अन्वेषक की वो तथ्य, जानकारी एवं कहानी बताते जा रहे थे और मैं उन्हें सुनता और समझता जा रहा था| कुछ ही घंटों की यात्रा के पश्चात हम पौंटा साहिब पहुंच गये| जहाँ भव्यमान था एक विशाल गुरुद्वारा| आप किसी भी गुरूद्वारे में जाएँ आप के मन को एक रूहानी एहसास होता है प्यारी सी शांति और आत्मा के परमात्मा से मेल की अनुभूति वहाँ अनुभव की जा सकती है| कुछ ऐसा ही अनुभव मुझे भी वहाँ हुआ मन प्रफुल्लित हो उठा और आत्मा तृप्त हो गयी| इस सुंदर एहसास को समेटे हम वहाँ साथ ही में लगते यमुना जी तट पर भी गये जहाँ कुछ श्रद्धालु श्रधा की दुबकी लगा रहे थे| कुछ वहीं स्थित मन्दिर में जाकर कर दर्शन कर रहे थे| कुछ पर्यटक इस सुंदर नजारे को अपने कैमरे में कैद कर रहे थे तो कुछ शांत वहाँ सीढीयों पर बैठे कुछ सोच रहे थे| वास्तव में एक अद्भुत अनुभव था जिसे भुला पाना मेरे लिए तो कभी भी सम्भव नहीं होगा|

मेरी बस का समय हो रहा था और घर तो वापिस आना ही पड़ता है मेरा भी सिरमौर जिला में रहने और घुमने का सफर अब बस अपने आखिरी पड़ाव पर था| कुछ ही दुरी पर वहाँ बस अड्डा था जहाँ से मुझे सभी से रुक्सत लेनी थी| जितना भी समय मैंने सिरमौर में और खास तौर पर राजेश जी और नीरज जी के साथ नैना टिक्कर, ददाहू, रेणुका जी, और पौंटा साहिब में बिताया जो मेरे जीवन के स्वर्णिम समय में सदैव शामिल रहेगा| उनका अपनत्व, स्नेह एवं प्रेम मेरी मनोस्मृतियों में चिर काल तक यथावत बना रहेगा| राजेश जी के सुंदर परिवार के आतिथ्य नीरज जी के साथ, सभी अध्यापक साथियों जो की नैना टिक्कर में मिले के प्यार, श्री मती गीता भट जी व श्री संदीप भट्ट जी, श्री शिशु भरद्वाज जी और उन सभी का जिनका नाम मैं सम्भवतः नहीं ले पा रहा हूँ तहे दिल से शुक्रगुजार हूँ|

अंत में फिर से कहूँगा की माये नि मेरिये शिमले दी राहे सिरमौर भी उतनी ही दूर…

जय हिन्द

युद्धवीर टंडन (कनिष्ठ आधारभूत शिक्षक रा. प्रा. पा. अनोगा) गावं तेलका जिला चम्बा हि. प्र. पिन कोड 176312 मोब. 78072-23683

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