वीरों की शान निराली होती है
मेरे वतन की मिटटी में लहू की महक कैसे होती है, क्यों मिलती नही किसी को जमीं ए वतन और परिंदों की मलकियत सारे आस्मां पे होती है, कौन है जो लौट के घर नहीं आया, क्यों दरवाजे पे आज भी दीदार ए नज़र होती है
ए खुदा बता मुझे वतन पर कुर्बान होने वालों की जिद क्या होती है, क्यों फितरत इनकी हर वक्त मतवाली होती है , हैरान होगा ए खुदा तू भी जान कर , मेरे देश के इन सपूतों की तो शान निराली होती है, मेरे देश के इन सपूतों की तो शान निराली होती है,।
लिपट कर तिरंगे में बड़ी शान से आते है, हर वक्त हथेली पे इनके जान होती है, होते होंगे वतन को बेचने वाले चन्द “जयचन्द”, मेरे सैनिक से तो देश की ऊँची शान होती है, देश के सपूतों की तो सरहद पर ईद और दिवाली होती है, मेरे देश के वीरों की शान निराली होती है, मेरे देश के वीरों की शान निराली होती है।
कह दो हवाओं से कि पैगाम उन तक पँहुचा देना , देश के गद्दारो को जरा समझा देना हर बार नहीं क्षमा यंहा स्वीकार होती है,
कोशिश चाहे लाख कर ले हिंदुस्तान की हस्ती न कभी खाक होती है, बन हिमालय खड़ा सिपाही इसी से तो  तिरंगे की पहचान  होती है, मेरे देश के सैनिक की तो सरहद पर ईद और दिवाली होती है, मेरे देश के वीरों की शान निराली होती है, मेरे देश के वीरों की शान निराली होती है।
खड़े सरहद पर हर दम, हर वक्त मौत सर पर सवार रहती है , मोत से ही दिल्लगी वतन से ही मोहब्बत होती है ,ऐसे वीरो से तो वतन की आबरु वतन की आन होती है, ऐसी अज़ब दास्ताँ  अज़ब ये कहानी होती है, देश के वीरों की शान निराली होती है देश के वीरों की शान निराली होती है।
आशीष बहल
चुवाड़ी जिला चम्बा