वर्षान्त स्वप्न


सारा दिसम्बर मैंने खिड़कियाँ नहीं खोली ,
वो दरख्तों के पत्ते गिर गये होंगे।
वो दरख्त पानी की त्रिवेणी अवस्था में नहाये होंगे,
उन पर न होगी चिडि़यों की अठखेलियाँ।
न होगा प्रवासी परिन्दों का कलरव,
स्वार्थी मनु संतान उन्हें काट रहा होगा।
पर्यावरण संतुलन बिगड़ रहा होगा।
उनके तने से गगनचुम्बी भवन बन रहे होंगे,
वो दरख्त ऋतुराज आगमन को व्याकुल होगा।
वो स्वार्थी मानव को माफ कर रहा होगा ,
इस विश्वास संग ,
कि कभी तो पछतायेगा अनजान आदमी |
देर तब बहुत हो चुकी होगी,
प्रलय बेला दरवाज़े पर दस्तक दे रही होगी।
फिर असहाय प्राणी हाथ मलता नज़र आयेगा।
मुझे तो यह दिवास्वप्न लगता है अंधविश्वास,
विश्व गुरु संतान कैसे तोड़ सकता है ईश का दृढविश्वास I
रवि कुमार संख्यान बिलासपुर
हिमाचल प्रदेश I