चम्बा की सांस्कृतिक धरोहर है मिंजर/आशीष बहल

सांस्कृतिक व ऐतिहासिक विरासत मिंजर मेला

हिमाचल प्रदेश में जिला चम्बा अपनी अलग पहचान रखता है। यंहा पर मनाए जाने वाले त्यौहार, मेले और पर्व सांस्कृतिक व ऐतिहासिक दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण रहते हैं। एक ऐसा ही त्यौहार है मिंजर मेला।

मिंजर मेला:


मिंजर मेला एक अंतरराष्ट्रीय मेला है जो हर साल सावन महीने में जुलाई के अंतिम रविवार से शुरू होकर एक सप्ताह तक चलता है। ये मेला चम्बा शहर के दिल कहे जाने वाले चौगान में लगता है। जंहा 7 दिन तक सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होता है और बहुत से लोग इस मेले में पँहुचते हैं। व्यापार की दृष्टि से ये मेला बहुत प्रसिद्ध है ।

सांस्कृतिक पहलू :


इस मेले में चम्बा की समृद्ध संस्कृति की झलक देखने को मिलती है। चम्बा के दूरदराज के इलाकों से लोग अपने पारम्परिक वेश भूषा में मेले का आनंद लेते हैं। चम्बा के लोकप्रिय लोकगीत सबका मन मोह लेते हैं। पहाड़ी कला का चम्बा में विशेष स्थान है। चम्बा को “कला नगरी” के रूप में भी जाना जाता है और मिंजर मेले में इसकी झलक देखने को मिलती है। मिंजर मेले का निमंत्रण पत्र महान चित्रकार पद्मश्री विजय शर्मा जी ने तैयार किया जिसमें पहाड़ी चित्रकला का साक्षात प्रमाण मिलता है।

चम्बा रुमाल भी अपनी एक अलग पहचान रखता है। इसके अलावा सावन महीने में चम्बा में गाए जाने वाले कुंजड़ी मल्हार लोकगीत भी इन दिनों गाए जाते हैं। यंहा कुंजू-चेंचलो, चम्बा आर की नदियां पार, सूही माता, चम्पावती, सुक्रोत आदि बहुत ही प्रसिद्ध लोकगीत हैं।

आध्यात्मिक पहलू:-
इस दिन लक्ष्मी नारायण मंदिर से पूजा अर्चना शुरू होती है और “भगवान रघुवीर” जी की पूजा के साथ मेले का शुभारंभ होता है। इस दिन जल के देवता “वरुण देव” जी की भी विशेष आराधना की जाती है। अंतिम दिन भगवान रघुवीर जी व चम्बा के सभी देवी देवताओं के साथ शोभायात्रा निकाली जाती है। राजा की निशानी लेकर घोड़ा आगे आगे चलता है। ये यात्रा रावी नदी तक निकाली जाती है जंहा भगवान को अर्पित किया जाने वाला पूजा का सामान विसर्जित किया जाता है।

प्राचीन काल में यंहा एक बछड़े (झोटा) भी प्रवाहित किया जाता था परन्तु समय के साथ साथ इन प्रथाओं को समाजहित में त्याग दिया गया।

मिंजर का सम्बद्ध:-

मिंजर का सम्बंध मुख्य रूप से मक्की की ओर धान की फसल के ऊपर लगने वाली मिंजर से है। कहते हैं कि उस समय लोग अधिक सम्पन्न नही होते थे और उनकी फसल ही उनका धन थी तो लोगो ने खुशी से राजा के सम्मान में ये फसल अर्पित की तभी से मिंजर मेला मनाया जाने लगा। लोग अपनी फसल के उगने पर खुशी व्यक्त करते हैं इसलिए किसानों के लिए भी ये मेला खास माना जाता है।

ऐतिहासिक दृष्टि:-
मिंजर मेला क्यों मनाया जाता है कब शुरू हुआ इसके बारे में अलग अलग धारणाएं प्रचलित हैं कोई भी इस पर एकमत नही मिलेगा।
ऐसा माना जाता है कि जब चम्बा के राजा ने त्रिगर्त के राजा पर विजयी पाई और वापिस लौटे तो लोगो ने उन्हें भेंट स्वरूप मक्की की फसल और धान की फसल पर लगने वाली मिंजर अपने राजा को अर्पित की तब से ये त्यौहार मनाया जाता है। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि चम्बा के राजा साहिल वर्मन कुरुक्षेत्र के युद्ध मे विजयी होकर लोटे थे तब लोगो ने उन्हें अपनी मक्की और धान की फसल की मिंजर अर्पित की थी। इसलिए ये त्योहार किसानों के लिए भी महत्वपूर्ण है इस दिन किसान भगवान को अपनी फसल अर्पित करते हैं ताकि उनकी फसल अच्छी हो।

मिर्जा परिवार बुनता है मिंजर:-

लोग रेशम के धागे से बनी मिंजर अपनी कमीज के आगे बांध कर रखते हैं ये कार्य राजा के आदेश से चम्बा का मुस्लिम मिर्जा परिवार करता आया है और कई सदियों से मिर्जा परिवार को बुनी मिंजर रघुवीर को समर्पित की जाती है।

ऐसा मानना है कि 17 वी सदी में चम्बा के राजा दिल्ली में शाहजंहा के शाषण काल मे किसी प्रतियोगिता में विजयी रहे और उन्होंने पुरस्कार के रूप में रघुवीर जी की मूर्ति शाहजंहा से मांगी तो उन्हें वो मूर्ति दे दी गयी उसे लेकर वो चम्बा आये तो दिल्ली के मिर्जा परिवार के वंशज भी उनके साथ आ गए और भगवान रघुवीर जी की देखभाल करने लगे तब से मिर्जा परिवार द्वारा मिंजर भगवान रघुवीर जी को चढ़ा कर ही मिंजर का शुभारंभ होता है। इसलिए ये त्यौहार धार्मिक सौहार्द की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है।

कला की नगरी चम्बा/सामान्य ज्ञान

पूरे जिले व हिमाचल में धूम:-

ये त्यौहार पूरे हिमाचल में मनाया जाता है खासकर चम्बा जिला के लोग इसे दीवाली से कम नही मानते। लोग अपने घरों में तरह तरह के पकवान बनाते हैं और खासकर भटुरु बनाये जाते हैं जिन्हें लेकर लोग परिवार सहित किसी खड्ड या नदी के किनारे जाकर जल देवता को अर्पित करते हैं। खड्ड व नदियों के राजा को ख्वाजा कहा जाता है उन्हें ये खाना भेंट करके सब मिलजुल कर वंही बैठ कर खाते हैं।

मिंजर मेला ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, व्यापारिक और आध्यात्मिक सभी दृष्टियों से एक बहुत ही खास त्योहार है। चम्बा का ये मिंजर मेला इस बार 29 जुलाई से 5 अगस्त तक मनाया जाएगा। आप सब परिवार सहित मिंजर मेले में पधारें और यंहा की संस्कृति को जाने।
जय भगवान रघुवीर जी की।
लेखक
आशीष बहल
चुवाड़ी जिला चम्बा।
विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में हिमाचल की लोकसंस्कृति के बारे में लिखते हैं।
9736296410

खूबसूरती का दूसरा नाम है “खज्जियार”

माँ काली का पहलवानी रूप है पोहलानी माता/Ashish Behal

http://www.bharatkakhajana.com/chamba-rumal-is-…ें-क्यों-प्रसिद्/

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *