आधुनिकता में आज हम क्यूँ बदलते जा रहे हैं।
छोड़ अपनी राह हम कहाँ चलते जा रहे हैं।।
संस्कृति अपनी परायी हो रही है क्यों।
आज किस वातावरण में कहाँ ढलते जा रहे हैं।।
विषधरों की श्रृंखला करती सियासत है यहाँ।
सर्प आस्तीन के कहाँ पलते जा रहे हैं।।
बीज कैसा बो गया उर्वरा इस भूमि पर।
अमरफल की जगह कैसे जहर फलते जा रहे हैं।।
देखकर खुशियाँ किसी की है हमे रहना सदा खुश।
आज तो पर देख उन्नति स्वयं जलते जा रहे हैं।।
डा.मीना कौशल
उ.प्र.