यंहा है शिव का अर्धनारीश्वर रूप-शिवरात्रि विशेष

यंहा है शिव का अर्धनारीश्वर रूप

शिवरात्रि विशेष

हिमाचल प्रदेश ऊंचे पर्वत भोले भाले लोग ओर भोलेनाथ के अनन्य भक्त। बस आप भोले की जय बोलिये और फिर देखिए जयकारा लगाने वाले भक्तों की भीड़ लग जायेगी। हिमाचल को शिवजी का ससुराल माना जाता है और कैलाश मणिमहेश पर्वत पर शिव का बास। यंहा बहुत से शिव मंदिर हैं। चाहे वो 12 ज्योर्तिलिंग में एक बैजनाथ हो, मणिमहेश, या फिर काठगढ़ का अलौकिक शिव मंदिर। आज आपको शिवरात्रि के उपलक्ष्य पर दर्शन करवाते हैं शिव के अर्धनारीश्वर रूप में विराजमान होने वाले एक खास मंदिर के जो कि जिला कांगड़ा के इंदौरा के अंतर्गत आता है और “काठगढ़ मंदिर” स्वयंभू शिव के नाम से जाना जाता है क्योंकि कोई नही जानता कि ये शिवलिंग कब से यंहा मौजूद है। इसलिए इसे स्वयं प्रकट हुआ बताया जाता है। ये मंदिर हिमाचल के साथ साथ पंजाब के लोगो का भी आस्था का केंद्र है।



मंदिर पँहुचने का मार्ग:
– इस मंदिर को जाने के लिए जालंधर जम्मू राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित कस्बा मीरथल से और दूसरा पठानकोट से डमटाल, कंदरोड़ी, इंदौरा होते हुए काठगढ़ पहुचा जा सकता है। कांगड़ा से जाते हुए जसूर से 25 km की दूरी पर स्थित है।

काठगढ़ शिव मंदिर:

हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के इंदौरा में काठगढ़ महादेव का मंदिर स्थित है। यह विश्व का एकमात्र मंदिर है, जहां शिवलिंग ऐसे स्वरूप में विद्यमान है, जो दो भागों में बंटा हुआ है।


अर्धनारीश्वर शिवलिंग:- ये शिवलिंग दो भागों में टूटा हुआ प्रतीत होता है। जिसमे एक शिवलिंग का भाग बड़ा और एक छोटा है।
ग्रहों और नक्षत्रों के परिवर्तित होने के अनुसार इन दोनों भागों के मध्य का अंतर घटता-बढ़ता रहता है।

शिवलिंग का रहस्य:-

शिव पुराण में वर्णित कथा- एक बार ब्रह्मा और विष्णु के मध्य श्रेष्ठता का विवाद उत्पन्न हो गया और दोनों दिव्यास्त्र लेकर युद्ध करने लगे। यह भयंकर स्थिति देख शिव वहां आदि अनंत ज्योतिर्मय स्तंभ के रूप में प्रकट हो गए, जिससे दोनों देवताओं के दिव्यास्त्र स्वतः ही शांत हो गए। ब्रह्मा और विष्णु दोनों उस स्तंभ के आदि, अंत का मूल जानने के लिए जुट गए। विष्णु शुक्र का रूप धरकर पाताल गए, मगर अंत न पा सके। ब्रह्मा आकाश से केतकी का फूल लेकर विष्णु के पास पहुंचे और बोले, मैं स्तंभ का अंत खोज आया हूं, जिसके ऊपर यह केतकी का फूल है। ब्रह्मा का यह छल देखकर शंकर वहां प्रकट हो गए और विष्णु ने उनके चरण पकड़ लिए। तब शंकर ने कहा कि आप दोनों समान हैं। तब से लोगो मे ये आस्था है कि काठगढ़ में स्थित यही अग्नि तुल्य स्तंभ काठगढ़ शिवलिंग के रूप में जाना जाने लगा। ईशान संहिता के अनुसार इस शिवलिंग का प्रादुर्भाव फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी की रात्रि को हुआ था। शिव का वह दिव्य लिंग शिवरात्रि को प्रकट हुआ था इसलिए लोक मान्यता है कि काठगढ़ महादेव शिवलिंग के दो भाग भी चंद्रमा की कलाओं के साथ करीब आते और दूर होते हैं। शिवरात्रि का दिन इनका मिलन माना जाता है। फिर गर्मियों में आते आते इसकी दूरी बढ़ती जाती है। और फिर इन दोनों भागों के बीच काफी गैप देखा जा सकता हूं। जो कि भक्तो के लिए उत्सुकता का विषय बना रहता है।

शिव-पार्वती का रूप है शिवलिंग:-दो भागों में विभाजित आदि शिवलिंग का अंतर कुछ समय के अनुसार घटता-बढ़ता रहता है और शिवरात्रि पर दोनों का मिलन हो जाता है। यह पावन शिवलिंग अष्टकोणीय है तथा काले भूरे रंग का है। शिव रूप में पूजे जाते शिवलिंग की ऊंचाई 7-8 फुट है जबकि पार्वती के रूप में अराध्य हिस्सा 5-6 फुट ऊंचा है। शिवरात्रि पर प्रत्येक वर्ष यहां पर तीन दिवसीय भारी मेला लगता है। शिव और शक्ति के अर्द्धनारीश्वर स्वरूप श्री संगम के दर्शन से मानव जीवन में आने वाले सभी दुःखों का अंत हो जाता है। भक्त दूर दूर से इस जगह पँहुचते हैं।

सिकन्दर से भी जुड़ी है कथा:
– सिकंदर जब पंजाब आया, तो प्रवेश से पूर्व मीरथल नामक गांव में पांच हजार सैनिकों को खुले मैदान में विश्राम की सलाह दी। उसने देखा कि एक फकीर शिवलिंग की पूजा में व्यस्त था। उसने फकीर से कहा, आप मेरे साथ यूनान चलें। मैं आपको दुनिया का हर ऐश्वर्य दूंगा। फकीर ने सिकंदर की इस बात को अनसुना करते हुए कहा, आप थोड़ा पीछे हट जाएं और सूर्य का प्रकाश मेरे तक आने दें। फकीर की इस बात से प्रभावित होकर सिकंदर ने टीले पर काठगढ़ महादेव का मंदिर बनाने के लिए भूमि को समतल करवाया और चारदीवारी बनवाई। इस चारदीवारी के ब्यास नदी की ओर अष्टकोणीय चबूतरे बनवाए, जो आज भी यहां हैं।


बाहरी दृश्य

राजा दशरथ और भरत की प्रिय पूजा-स्थली:-

मान्यता है कि राजा दशरथ की बारात ने भी यंही विश्राम किया था और भगवान शिव का आशीर्वाद लिया था। त्रेता युग में भगवान राम के भाई भरत जब भी अपने ननिहाल कैकेय देश (कश्मीर) जाते थे, तो काठगढ़ में शिवलिंग की पूजा किया करते थे। शिवरात्रि के त्यौहार पर प्रत्येक वर्ष यहां पर तीन दिवसीय भारी मेला लगता है। शिव और शक्ति के अर्द्धनारीश्वर स्वरुप श्री संगम के दर्शन से मानव जीवन में आने वाले सभी पारिवारिक और मानसिक दु:खों का अंत हो जाता है। इसके अलावा सावन के महीने में भी यंहा एक बहुत बड़े मेले का आयोजन होता है। सावन के सोमवार को यंहा भक्तों का तांता लगा रहता है।

पिकनिक के लिए भी प्रसिद्ध:- ये स्थान बच्चो के लिए भी बहुत ही रमणीय है। स्कूल कॉलेज के बच्चे यंहा पिकनिक के लिए आते हैं। 

हिमाचली रिश्तों के लिए यंहा क्लिक करें

https://www.himachalirishta.com/

आजकल मंदिर के पीछे बहुत ही खूबसूरत पार्क बनाकर पर्यटकों को आकर्षित करने का भी कार्य किया गया है। जो अपने आप मे एक बहुत ही खूबसूरत प्रतीत होता है।

आशीष बहल
चुवाड़ी जिला चम्बा

पढ़िये हिमाचल के अन्य शिव मंदिरों की रोचक जानकारी

जानिए कब और कैसे करे महाशिवरात्रि ब्रत

हाथियों ने दिया महादेव को कुंजर महादेव का नाम/Ashish Behal

सिरमौर के भुर्शिंग महादेव की अदभुत कहानी/Yudhveer

यंहा माना जाता है दुनिया का सबसे बड़ा शिवलिंग

One comment

  1. Pingback: - BharatKaKhajana

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *