शक्तिपीठ माँ ब्रजेश्वरी देवी मंदिर कांगड़ा/Ashish Behal

शक्तिपीठ माँ ब्रजेश्वरी देवी मंदिर कांगड़ा

हिमाचल प्रदेश देवभूमि के नाम से प्रसिद्ध है। हिमाचल में जंहा शिव के प्रति असीम श्रद्धा है तो वंही यंहा माता रानी के भी अनन्य भक्त है। देश विदेश से यंहा श्रद्धालु माता के मंदिरों में पँहुचते है। माता चामुंडा, माता ज्वाला, माता चिंतपूर्णी, माता नैना देवी, माता ब्रजेश्वरी के रूप में सभी देवियों का वास हिमाचल में है। 

आज आपको नवरात्रो में दर्शन करवाते हैं कांगड़ा वाली माता यानी माता ब्रजेश्वरी के।



माता बज्रेश्वरी देवी के प्रति अटूट श्रद्धा के कारण नगरकोट धाम कांगड़ा में वर्ष भर भक्त आते रहते हैं। परंतु साल में आने वाले 2 नवरात्रो के दिनों में चैत्र श्रावण और आश्विन के नवरात्रों में यहां विशेष मेलों का वातावरण होता है।

प्रचलित कथा:- हिमाचल के सभी मंदिरों ने श्रद्धालुओं की आस्था यूँ ही नही बनी यंहा के हर मंदिर के पीछे कोई न कोई कथा अवश्य रहती है और वही भक्तों की आस्था का केंद्र है।
पौराणिक कथा के अनुसार सती पार्वती के पिता दक्ष प्रजापति ने अपनी राजधानी में एक यज्ञ का आयोजन किया था। जिसमें सभी ऋषि-मुनियों को बुलाया गया था परंतु भगवान शंकर को उस में आमंत्रित नहीं किया था। इस अपमान को सहन न करने के कारण सती ने अपने पिता तथा अन्य उपस्थित ऋषि- मुनियों के सम्मुख हवन कुंड में कूदकर अपने प्राण त्याग दिए थे। जब भगवान शंकर को इसका पता चला तो उन्होंने अपने गणों को यज्ञ विध्वंस करने की आज्ञा दे दी तथा स्वयं सती की मृत्यु को देखकर स्थिर हो गए। शंकर सती की देह को कंधे पर उठाकर ब्रह्मांड में घूमने लगे। सभी देवी- देवता भगवान शंकर की इस अवस्था को देख कर विनाश की आशंका से अत्यंत भयभीत हो गए। तब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शव को 51 भागों में काट दिया। सती के शरीर के ये 51 अंग जहां-जहां गिरे वहीं शक्तिपीठ स्थापित हो गए। कहा जाता है कि कांगड़ा में सती का वाम वक्ष स्थल गिरा तथा यह बज्रेश्वरी शक्तिपीठ कहलाया।

मकर सक्रांति का भी विशेष महत्व:- मकर सक्रांति के समय माता की पिंडी को बहुत ही खूबसूरत ढंग से घी से सजाया जाता है।


मकर संक्रांति के उपलक्ष में आयोजित होने वाले घृत मंडल पर्व पर भी दूर-दूर से भक्त यहां आते हैं। कहते हैं कि जालंधर दैत्य को मारते समय माता के शरीर पर अनेक चोटें आई थीं तथा देवताओं ने माता के शरीर पर घृत का लेप किया था। उसी परंपरा के अनुसार यहां हर साल मकर संक्रांति के दिन देशी घी का मक्खन बनाकर माता की पिंडी पर चढ़ाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि ये घी जिसे भी प्रसाद स्वरूप मिलता है वो बहुत सौभग्य वाला होता है और चरम रोगों पर लगाने से वो पूरी तरह ठीक हो जाता है।

मंदिर का इतिहास- माता का ये मंदिर बहुत प्राचीन माना जाता है। कांगड़ा में माता बज्रेश्वरी का मंदिर 9वीं शताब्दी में से लेकर 10 वीं शताब्दी तक तंत्र विद्या का एक केंद्र रहा है। यह भारत के तंत्र विद्या केंद्रों में से एक था। 4 अप्रैल 1905 को समूचे कांगड़ा क्षेत्र में आए भीषण भूकंप की चपेट में माता बज्रेश्वरी देवी मंदिर पूर्ण रूप से ध्वस्त हो गया था। लाखों रुपए की संपत्ति एवं हीरे-जवाहरात इस मलबे के ढेर के नीचे दबे रह गए। दिसंबर 1908 में मंदिर के पुनर्निर्माण एवं प्रबंध की तैयारी शुरू की गई। वर्ष 1914-15 में नए बनने वाले मंदिर का डिजाइन तैयार किया गया। भूकंप के 25 साल के बाद 1लाख 92 हजार रुपए की राशि मंदिर के निर्माण हेतु एकत्रित की गई। पालमपुर तहसील के द्रंग स्थान से निकाले गए पत्थर को मंदिर के प्रयोग के लिए स्वीकार किया गया। सन् 1930 में वर्तमान मंदिर शिखर शैली में बनकर तैयार हुआ।

महमूद गजनी ने किया हमला:- ब्रजेश्वरी मंदिर में 1009 ई में महमूद गजनी में भारी लूटपाट की थी। कांगड़ा में लूटपाट करने वाला वो पहला लुटेरा था।

स्थापत्य कला व अन्य विशेषताएं-

मंदिर परिसर में विभिन्न देवी-देवताओं की लगभग 40 मूर्तियां हैं जिन्हें 7 वीं से 12 वीं शताब्दी के बीच की निर्मित माना जाता है। माता की पिंडी के साथ एक त्रिशूल है, यह त्रिशूल सैकड़ों वर्ष पुराना है तथा अष्ट धातु से बना है। कहते हैं कि जिस स्त्री को प्रसव में कठिनाई आ रही हो, इस त्रिशूल के ऊपर जल चढ़ाकर एक पात्र में इकट्ठा करके उस स्त्री को पिलाने से तुरंत प्रसव हो जाता है। इसी प्रकार जिस व्यक्ति के प्राण गले में फंसे हों, उसे भी इस त्रिशूल का जल पिलाने से तुरंत सद्गति प्राप्त होती है। यहां रोजाना माता का शृंगार करने के उपरांत माता की पिंडी की पूजा नहीं की जाती बल्कि उसके स्थान पर मां की पिंडी के आगे रखे श्री यंत्र की पूजा की जाती है। मंदिर में पूजा-अर्चना के समय प्रातः पुजारी शैय्या को उठाने के पश्चात आसन ग्रहण करके मंगल आरती करता है। जिसमें मां को पंचमेवा का भोग लगाया जाता है। फिर शृंगार उतारने के पश्चात पंचामृत सहित पिंडी महारानी के स्नान कराने के बाद पीले चंदन से लेप कर के आभूषणों से शृंगार किया जाता है। उसके बाद काले चने और पूरी का भोग लगाकर आरती की जाती है।  इस समय भी चने और पूरी का भोग मां को लगाया जाता है। उसके पश्चात मां की शैय्या लगाई जाती है और मंदिर बंद होने से पूर्व मां को दूध, चना और मिठाई का भोग लगाया जाता है। वर्ष 1986 में मंदिरों के अधिग्रहण के बाद माता बज्रेश्वरी देवी मंदिर भी ट्रस्ट के अधीन चलाया जा रहा है। जबकि मंदिर के चढ़ावे का कुल 40 फीसदी भाग पारंपरिक पुजारियों को उनकी बारी के अनुसार दिया जाता है।

स्थान:- कांगड़ा जिला हिमाचल के सबसे प्रसिद्ध और उन्नत जिला है। हर जगह से यंहा पँहुचने के लिए बस इत्यादि की सुविधा है।


रेलगाड़ी के माध्यम से भी पठानकोट- जोगिन्दरनगर रेलवे ट्रैक के बीच कांगड़ा मंदिर स्टेशन आता है अधिकतर श्रद्धालु इसी रास्ते मंदिर आते है। इसके अलावा हर राज्य से बस यंहा पंहुचती है।
हवाई मार्ग के द्वारा भी यंहा पंहुचा जा सकता है। जिसमें गग्गल एयरपोर्ट से आप यंहा पँहुच सकते है जो कांगड़ा से महज 10 km की दूरी पर है।

आशीष बहल
चुवाड़ी जिला चम्बा

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