संस्कारो की भाषा हिन्दी/आशीष बहल

संस्कारो की भाषा है हिन्दी

किसी भी राष्ट्र की उन्नति की परिचायक है वंहा की मातृभाषा। भाषा कहने को तो विचारों के आदान प्रदान का साधन मात्र है परन्तु इस से बहुत से साध्यों को भी साधा जा सकता है। हिंदी हमारे संस्कारो से जुडी है इसलिए ये मात्र भाषा ही नहीं मातृभाषा है। हिंदी हम भारतवासियों के माँ के समान है इसलिए मातृभाषा कहलाती है | गर्व से स्वीकारते हैं कि हम हिंदी भाषी हैं | अनेकता में एकता का स्वर हिंदी के माध्यम से गूंजता हैं | जीवन में भाषा का सबसे अधिक महत्व होता हैं | एक भाषा ही हममे तहज़ीब का विकास करती हैं | इसी कारण सभी देशो की अपनी एक मूल भाषा होती हैं जिसका सम्मान करना देशवासियों का कर्तव्य हैं |माना कि भाषा भावनाओं को व्यक्त करने का एक साधन मात्र हैं लेकिन इस साधन में वो बल हैं जो दुनियाँ को बदल सकता हैं | विभिन्नताओं के बीच एक भाषा ही हैं जो एकता का आधार बनती हैं और हम सभी को इस एकता के साधन का सम्मान करना चाहिये | हिंदी हमारी मातृभाषा हैं जिसे सम्मान देना हमारा कर्तव्य हैं |

14 सितम्बर का दिन हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। 14 सितम्बर 1949 को हिंदी को राजभाषा होने का गोरव् प्राप्त हुआ। उसके बाद सन 1953 से हर वर्ष 14 सितम्बर का दिन हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। हिंदी भारत में सबसे अधिक 65 % लोगो द्वारा बोली व समझी जाती है 30 % लोग अन्य भाषाओँ को समझते व् बोलते हैं जबकि 5 % लोग अंग्रेजी भाषा का प्रयोग करते हैं। हिंदी भाषा की लिपि देवनागरी तथा प्रचीन रूप संस्कृत है। हिंदी ने भारत की धरती पर कई उतार चढ़ाव देखे हैं।हम हिंदी भाषा की बात तो करते हैं परन्तु कभी उसके उन्नत इतिहास को जानने का प्रयत्न नहीं करते और न ही आने वाली नई पीढ़ी को बताते हैं ।यंहा आज के दिन आप पाठको को हिंदी के इतिहास से अवगत करवाना चाहूँगा। हिंदी का साहित्य 1000 ईसवी से प्राप्त होता है। इससे पूर्व प्राप्त साहित्य अपभ्रंश में है इसे हिंदी की पूर्व पीठिका माना जा सकता है। पुरे विश्व में भारतीय संस्कृति ही सबसे पुरानी है जब विश्व के अन्य लोग संकेतो की भाषा का प्रयोग करते थे हमारे पास अपनी भाषा और लिपि थी ‘संस्कृत’ संस्कृत को बहुत सी भाषाओँ की जननी माना गया है। हिंदी भाषा भी कालान्तर में संस्कृत से निकली है संस्कृत से पालि ,प्रकृत और अपभ्रंश से हिंदी। हिंदी को तीन कालो में विभाजित किया गया है आदि काल (1000 -1500 ई) इस काल में दोहे आदि का समावेश हुआ इसके बाद मध्यकाल (1500-1800ई) तक इस समय कई रचनाएँ तुलसीदास,मीरा, कबीर जैसे संतो ने की तथा इस समय मुगलों ,फ्रंसियो ,ईरानियों और तुर्को से लेकर अंग्रेजो तक की भाषा भारत में प्रचलित रही पर वावजूद इसके हिंदी के वर्चस्व को मिटा नहीं पाई। आधुनिक काल 1800 से अब तक जिसमे हिंदी को नई पहचान मिली और हिंदी का विस्तृत और आधुनिक रूप हम सब भारतवासियों के समक्ष है ।हिंदी शब्द की उत्पति ‘सिन्धु’ से जुडी है। ‘सिन्धु’ ‘सिंध’ नदी को कहते है। सिन्धु नदी के आस-पास का क्षेत्र सिन्धु प्रदेश कहलाता है। संस्कृत शब्द ‘सिन्धु’ ईरानियों के सम्पर्क में आकर हिन्दू या हिंद हो गया। ईरानियों द्वारा उच्चारित किया गए इस हिंद शब्द में ईरानी भाषा का ‘एक’ प्रत्यय लगने से ‘हिन्दीक’ शब्द बना है जिसका अर्थ है ‘हिंद का’। यूनानी शब्द ‘इंडिका’ या अंग्रेजी शब्द ‘इंडिया’ इसी ‘हिन्दीक’ के ही विकसित रूप है।
हिंदी भाषा की सबसे बड़ी विशेषता ये रही कि जो भी बोलिया या भाषाएँ हिंदी के सम्पर्क में आई वो हिंदी में समा गयी। हिंदी में अरबी,उर्दू,फारसी,तुर्की इत्यादि बहुत सी भाषाओँ के अनेको शब्द मिल जायंगे जो समय के साथ साथ हिंदी में मिलते गये और हिंदी ने एक माँ की भांति सबको अपने दामन में भर लिया।इसके बाद आधुनिक काल ने 1900 इसवी के बाद भारतेंदु हरिश्चन्द्र,सुभद्रा कुमारी चौहान,जयशंकर प्रसाद,आदि महान कवियों और लेखको ने आधुनिक हिंदी का रूप दिया। हिंदी भाषा सभी भाषाओँ में सबसे वैज्ञानिक भाषा मानी गयी है इसमें छोटे छोटे शब्दों और मात्राओं को भी उच्चारण के माध्यम से वैज्ञानिक ढंग से समझाया गया है। ऐसी महान भाषा है हिंदी। परन्तु बहुत अफ़सोस के साथ कहना पड़ता है कि एक लम्बे और गोरवमायी इतिहास के वावजूद हिंदी आज अपने अस्तित्व की जंग लड़ती नजर आ रही है। आज हिंदी को मात्र दिवस बना कर ही रख दिया गया है आज तक हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा हासिल नहीं है आज भी हमारे कामकाज से लेकर हमारी शिक्षा तक में हिंदी को प्राथमिकता नहीं दी जाती और तो और हिंदी बोलने में आज का युवा शर्म महसूस करता है। हम अपनी भाषा को आज भी वो स्थान नहीं दिलवा पाए जो इसे मिलना चाहिए था। कहने को तो हम 1947 को अंग्रेजो से आज़ाद हो गये परन्तु अंग्रेजी के गुलाम ही रह गये। अपनी मातृभाषा को छोड़ कर कभी भी विकास हासिल नहीं किया जा सकता। आज अंग्रेजी भाषा की पैरवी करने वाले कहते हैं कि अंग्रेजी के बिना कोई देश आगे नहीं बढ़ सकता परन्तु वो शायद चीन,जापान और रशिया जैसे देशो को भूल गये जन्हा पर पूरी की पूरी शिक्षा अपनी मातृभाषा में दी जाती है और वो देश आज विकसित देशो की श्रेणी में खड़े नजर आते हैं। यंहा पर मेरा मत ये कदापि नहीं की अंग्रेजी भाषा का वहिष्कार हो, नहीं अंग्रेजी हम सिख सकते हैं बोल सकते है वो भी किसी की मातृभाषा है परन्तु मेरा मत बस इतना है कि दुसरे की माँ को माँ कहना पाप नहीं परन्तु दुसरे की माँ के लिए अपनी माँ की बेइजती करना भी कंही का धर्म नहीं।
आज देश में एक ऐसा समाज पल रहा है जो अपनी मातृभाषा से दूर हो रहा है और अफ़सोस तो इस बात का है कि वो मात्र अपनी भाषा से ही नहीं अपनी मातृभूमि से भी दूर हो गया है। अंग्रेजी के फैशन में इस तरह लिपटने का प्रयास आज की नई पीढ़ी कर रही है जिसका कोई अंदाज़ा नहीं लगा सकता और ऐसा वर्ग हिंदी को मातृभाषा से मात्र भाषा बनाने में लगा है ।पिछले दिनों मेरे एक जानकार बड़ी शान के साथ जिक्र कर रहे थे कि मेरे बेटे को स्कुल में 500 रूपये जुर्माना हुआ क्यूंकि उसने पहली बार स्कूल में हिंदी का शब्द प्रयोग किया। मै सुन कर हैरान था और सोचने पर मजबूर कि आखिर हम कन्हा जा रहे है हम उस महान भाषा की बेइजती करने पर क्यों उतर आये जिसने देश को आज़ाद करवाने में अहम भूमिका निभाई लोगो को जोड़ कर। और आज उसी हिंदी को दूषित माना जा रहा है हिंदी भाषा का प्रयोग स्कूल में करने पर अब जुर्माना देना पड़ेगा ये कौन सी सभ्यता है ये कन्हा की संस्कृति है। मातृभाषा से व्यक्ति निर्माण होता है, व्यक्ति से समाज का समाज से राष्ट्र का और राष्ट्र से विश्व का निर्माण होता है। हम अपनी मातृभाषा के बिना कल्पना भी नहीं कर सकते कि समाज को संस्कारी बना सकें। इसलिए कहा भी गया है कि “हिंदी मात्र सरोकारों की नहीं संस्कारो की भाषा है” । हम अपनी आने वाली पीढ़ी को जो संस्कार देना चाहते हैं वो कभी अपनी भाषा की बलि चढ़ा कर नहीं दिए जा सकते। नई पीढ़ी अंग्रेजी बोलना तो सीख सकती है परन्तु भावनाओं का समावेश बिना मातृभाषा के सम्भव नहीं। आज जरूरत है कि हमारे देश की सरकारें भी इस और ध्यान दें ऐसे शिक्षण संस्थान जन्हा हिंदी को बोलना निषेध है उन पर कार्यवाही हो। हिंदी भारत माता के मस्तक की बिंदी है। हम सुसंस्कृत और संस्कारी समाज की कल्पना बिना हिंदी के कभी नहीं कर सकते। हिंदी विश्व की तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। आज यदि हम हिंदी को मात्र एक दिन तक समेट देंगे तो हिंदी इन संकीर्णता की बेड़ियों से कभी आज़ाद नहीं हो पायेगी। आज आवश्यकता है हिंदी को खोया हुआ गोरव वापिस देने की। हम ये नहीं चाहते कि हमारा बच्चा अंग्रेजी न सीखे बल्कि वो अंग्रेजी में महारत हासिल करे वैसे भी अंग्रेजी बोलने वालों में संख्या के हिसाब से भारत पुरे विश्व में दुसरे स्थान पर है। अंग्रेजी का ज्ञान हासिल किया जाये परन्तु साथ में इस बात की तरफ भी ध्यान देना होगा कि हिंदी भाषा का तिरस्कार न हो। हिंदी भारत माता के हाथो में उस फूल के समान है जिसकी महक पुरे भारत वर्ष में फैली है। आज हम सबका ये परम कर्तव्य है कि हम हिंदी के उन्नत व गोरव मयी इतिहास को संजोये और आने वाले हिंदी के भविष्य को उज्ज्वल बनाये क्यूंकि हिंदी है हम हिंदुस्तान है वतन हमारा।
लेखक परिचय
आशीष बहल
Jbt अध्यापक

चुवाड़ी जिला चम्बा
ph 9736296410

3 comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *