गुड़िया कब तक टूटेगी?

आखिर कब तक गुड़िया टूटेगी?

देवभूमि यानि जंहा देवताओं का वास हो, जंहा के कण कण में देवता विराजमान हो कुछ ऐसी ही संज्ञा दी जाती है हमारे हिमाचल को और जब भी हिमाचल की बात कंही होती है तो बोला जाता है शांत, स्वस्थ और भोले भाले लोगो का प्रदेश। जी हां हिमाचल जितना खूबसूरत है वैसी ही शालीनता ओर सद्भभाव यंहा के लोगों में भी रहा है। परंतु अब तो मानो जैसे किसी की नज़र ही लग गयी है हिमाचल को। आए दिन ऐसी ऐसी घटनाएं सुनने को मिलती हैं कि मानो पांव तले जमीन ही खिसक जाए। यंहा का शुद्ध वातावरण जैसे किसी दूषित हवा का शिकार हो गया हो। पिछले एक दशक में हिमाचल में होने वाली घटनाओं ने जैसे हिमाचल को अंदर से झकझोर कर रख दिया हो। कंही भाई भाई का दुश्मन बना बैठा है कंही बाप बेटी के रिश्ते तार तार हो रहे हैं । आज आए दिन कंही हत्या, मार पीट ओर बलात्कार की घटनाओं ने ऐसा तांडव इस शिवभूमि पर मचाया है जैसे मानो ये वो साफ छवि वाला हिमाचल था ही नही। अभी कुछ दिन पहले वन रक्षक होशियार सिंह की हत्या ने हिमाचल की साख पर धब्बा लगाया तो अभी ये नन्ही गुड़िया के बलात्कार और हत्या ने सबको झकझोर कर रख दिया। बिटिया के साथ जो हुआ उसके साथ पूरा हिमाचल रोया ओर आज भी रो रहा है। और भला रोये भी क्यों न बेटी थी वो हिमाचल की। और हिमाचल वासी ऐसी बातों को हल्के में नही लेते क्योंकि देवभूमि में राक्षस तांडव नही मचा सकते उन्हें सजा मिलनी भी चाहिए और मिल कर रहेगी। इस मुद्दे पर हर कोई अपने अपने ढंग से सोच रहा है और संघर्ष भी कर रहा है। जब तक तो संघर्ष और गुस्सा बिटिया के लिए है तब तक तो ठीक है परंतु जब ये मात्र एक हिंसक प्रदर्शन है तब ये और घातक होगा हमारी देवभूमि के लिए। चलिए छोड़िये राजनीतिक पहलू या किसकी विफलता किसकी सफलता इसके ऊपर मुझे यंहा बिल्कुल भी बात नही करनी। यंहा मेरे दिमाग मे जो एक प्रश्न कौंध रहा है वो ये कि आखिर हिमाचल को हो क्या गया? क्यों हमारी देवभूमि राक्षस प्रवृत्ति के अधीन होती चली जा रही है? आखिर इसका हल क्या है? ये मूल्यों का पतन है और कुछ भी नही जब हम लोगो ने अपने संस्कारो और नैतिक मूल्यों को भुला कर जीवन यापन किया तब पनपी ऐसी घातक प्रवृत्ति। हमारा समाज हमेशा सुसंस्कृत रहा है यंहा के विचार और आचरण शुद्ध रहे हैं परन्तु आज का युवा समाज से दूर हो चुका है जैसे जैसे समाज मे आधुनिकी करण पांव पसार रहा है वैसे वैसे समाज से परिवार की दूरियां भी बढ़ रही है। परिवार मूल्यों की शिक्षा के स्त्रोत है और जैसे विचार और संस्कार परिवार देता है वैसे समाज मे प्रेषित होते हैं। और इस तरह बनता है एक समाज। अब समाज मे कुछ ऐसे लोग पैदा होते हैं जो समाज की नींव को अपने कुकृत्य से कलंकित करते हैं जैसा हिमाचल में हुआ। हिमाचल की देवभूमि में जब ऐसी राक्षस प्रवृति के लोग पनपे तब शिकार बनी गुड़िया। गुड़िया समाज के उन वहशी दरिंदो की शिकार हुई जो सिर्फ समाज को कलंकित करने के लिए पैदा हुए थे। पर प्रश्न उठता है कि कितनी गुड़ियाँ ऐसे ही टूटती रहेंगी? कब तक गुड़िया इस समाज के वहशी दरिंदो के आगे अपनी आहुति देती रहेगी।
एक तरफ बात होती है महिला सशक्तिकरण की, बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ के नारे दिए जाते हैं। समाज मे बेटी को उचित स्थान मिले इसके लिए कई प्रोग्राम चलते हैं पर हकीकत क्या है ये हम सबके सामने है। ऐसी ही गुड़िया आज रोज दरिंदो की शिकार हो रही है। कहने को हमारा समाज पढ़ा लिखा समाज हो गया है कहने को हम हर घर मे शिक्षा पँहुचा रहे हैँ। पर कैसी शिक्षा, कैसी सभ्यता जंहा नारी को मात्र भोग की वस्तु समझा जा रहा है। आए दिन बेटियों के साथ बलात्कार, हत्या जैसे संगीन अपराध किये जा रहे हैं। क्या आज की शिक्षा ये सिखाती है इस पर किसी ने ध्यान ही नही दिया और हम आधुनिकीकरण की अंधी दौड़ में शामिल हो गए जंहा मिला तो बस अपराध, खून खराबा, हत्या बलात्कार जैसी मानसिकता से ग्रस्त समाज। बेटियां घर ,समाज और देशनक श्रृंगार हैं जंहा बेटियों के साथ ऐसे कृत्य किये जायेंगे वँहा देवताओ का वास कदापि नही हो सकता। और हां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ऐसे अपराधों को कभी भी कानून व्यवस्था से ठीक नही किया जा सकता। कानून सिर्फ नियंत्रित कर सकता है अनुशासित नही। क्योंकि अनुशासन भीतर से पनपता है और नियंत्रण बाहर से किया जाता है। आज समय आ गया है कि एक बार हम समाज मे पनप रही ऐसी मानसिकता को खत्म करें जो समाज मे ऐसे दरिंदे पैदा करती है। अपने बच्चों को सिर्फ शिक्षा ही न दें उन्हें मूल्यों का पाठ भी पढ़ाया जाए। उनके अंदर समाज हित का समावेश ही न कि समाज के अहित का। आज ऐसी कई गुड़िया समाज से प्रश्न पूछ रही हैं कि आखिर मेरा कसूर क्या है? बस यही की मैं लड़की हूँ आज भी मैं समाज मे भय के वातावरण में जी रही हूं। आखिर कब बदलेगी ये मानसिकता आखिर कब बन्द होगा समाज मे ये शोषण। आखिर कब तक द्रोपदी का चीर हरण होता रहेगा कब तक माता सीता को अग्नि परीक्षा देनी होगी। आखिर कब तक समाज को जीवन देने वाली नारी अपने अस्तित्व के लिए लड़ती रहेगी। कितनी गुड़िया टूट चुकी है , कितनी गुड़िया और टूटेगी? आखिर कब रुकेगा ये सिलसिला कब तक गुड़िया टूटेगी, कब टूटेगी कब तक , कब तक????

“टूटते हुए खिलौनों को देखा है,
सिसकते हुए उन होंठो को देखा है,
नोच डाली वो गुड़िया वहशी दरिंदो ने
समाज मे पलते ऐसे कई जलादों को देखा है।”

आशीष बहल
चुवाड़ी जिला चम्बा
हि प्र
Ph 9736296410

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