जानिए खूबसूरत कांगड़ा के बारे में ये जानकारी


प्रकृति का वरदान है कांगड़ा

हिमाचल प्रदेश अपनी अदभुत और मनमोहक खूबसूरती के लिए विश्वविख्यात है। इसके 12 जिले अपनी अलग ही पहचान रखते हैं उन्ही में से एक काँगड़ा हिमाचल प्रदेश का ऐतिहासिक नगर तथा जिला है। इसका अधिकतर भाग पहाड़ी है।

इसके उत्तर और पूर्व में क्रमानुसार लघु हिमालय तथा बृहत्‌ हिमालय की हिमाच्छादित श्रेणियाँ स्थित हैं। पश्चिम में शिवालिक तथा दक्षिण में व्यास और सतलज के मध्य की पहाड़ियाँ हैं। बीच में काँगड़ा तथा कुल्लू की सुन्दर उपजाऊ घाटियाँ हैं। काँगड़ा चाय और चावल तथा कुल्लू फलों के लिए प्रसिद्ध है। व्यास (विपासा) नदी उत्तर-पूर्व में रोहतांग से निकलकर पश्चिम में मीर्थल नामक स्थान पर मैदानी भाग में उतरती है।

स्थान
:-

काँगड़ा नगर लगभग 2,350 फुट की ऊँचाई पर पठानकोट से लगभग 85 किलोमीटर दूर है। गग्गल एयरपोर्ट 8 किलोमीटर दूर है।

प्रसिद्ध:-
कांगड़ा में कई संस्कृति और कलाएं फली फूली हैं। कांगड़ा के लोकगीत बहुत प्रसिद्ध हैं। यंहा का शादी समारोह अपनी विशेष पहचान रखता है। यंहा की धाम बहुत प्रसिद्ध है। ‘काँगड़ा कलम’ विश्वविख्यात है और चित्रशैली में विशेष स्थान रखती है।



बीड़ बिलिंग पैराग्लाइडिंग के लिए मशहूर है।

पहाड़ी कविता और लोकगीत कांगड़ा की जान है। यंहा पढिए और सुनिए पहाड़ी कविताएं

http://www.bharatkakhajana.com/category/देशभक्ति/ashish_behal_poetry/पहाड़ी-कविता/

आस्था का क्षेत्र:-
धर्म और संस्कृति में कांगड़ा अपनी विशेष पहचान रखता है। यंहा के मंदिर बहुत प्रसिद्ध हैं। आइये जाने इन मंदिरों के बारे में।

बृजेश्वरी देवी मंदिर :-


यह मंदिर इस क्षेत्र का सबसे लोकप्रिय मंदिर है। कहा जाता है पहले यह मंदिर बहुत समृद्ध था।, इस मंदिर को बहुत बार विदेशी लुटेरों द्वारा लूटा गया। महमूद गजनवी ने 1009 ई॰ में इस शहर को लूटा और मंदिर को नष्ट कर दिया था। यह मंदिर 1905 ई॰ में विनाशकारी भूकम्प से पूरी तरह नष्ट हो गया था। सन् 1920 में इसे दोबारा बनवाया गया। अजय बन्‍याल ने इसके लिए काफी अहम कार्य किया है जो कि आज भी किताबों में ढूंढने पर नहीं मिल पाता है।

चामुंडा माता मंदिर:-
ये मंदिर भी बहुत प्राचीन है। माता का नया मंदिर कांगड़ा से लगभग 25 किलोमीटर की दूरी पर ढांड नामक स्थान में है। जबकि प्राचीन मंदिर हिमानी चामुंडा के नाम से विख्यात धौलाधार पर्वत शृंखला में है।

ज्वालामुखी माता मंदिर:-


ज्वालामुखी माता का मंदिर ज्वाला जी मे है। जो कांगड़ा शिमला हाई वे में स्थित है। यंहा कुदरती तरीके से माता की ज्योति जलती रहती है। अकबर ने अपने कार्यकाल में इस मंदिर में सोने का छत्र चढ़ाया था। जो माता की शक्ति के आगे नतमस्तक हुआ था।

मशरूर मंदिर:-

Elora of himachal masrur rockkut temple

काँगड़ा के दक्षिण से 15 कि॰मी॰ दूर स्थित मशरूर नगर समुद्र तल से 800 मीटर की ऊँचाई पर है, इस नगर में 15 शिखर मंदिर है। 

इस मंदिर में खास बात ये है कि ये एक चट्टान को काटकर बनाये गये इन मंदिरों का सम्बन्ध दसवीं शताब्दी से है। इसे पांडवो ने निर्मित किया था।यह मंदिर इंडो-आर्यन शैली में बना हुआ हैं। इन मंदिरों की तुलना अजंता और एलौरा के मंदिरों से की जाती है। इस मंदिर की अधिक जानकारी आप यंहा पढ़ सकते हैं।

बाथू की लड़ी:-

बाथू की लड़ी एक पहेली/Ashish Behal

पोंग डैम के मध्य ज्वाली में एक बहुत ही खयबसूरत स्थान यंहा स्थित है जिसे महाभारत काल मे पांडवो ने बनाया था। वो यंहा स्वर्ग की सीढ़िया बनाना चाहते थे।

बाथू की लड़ी की रोचक जानकारी आप यंहा क्लिक करके पढ़ सकते हैं। इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की Mygov India द्वारा भी शेयर किया गया था।
देखिए ये वीडियो

काँगड़ा किला
काँगड़ा के शासकों की निशानी यह किला भूमाचंद ने बनवाया था। वाणगंगा नदी के किनारे बना यह किला 350 फीट ऊँचा है। इस किले पर अनेक हमले हुए हैं।

सबसे पहले कश्मीर के राजा श्रेष्ठ ने 470 ई॰ में इस पर हमला किया। सन् 1886 में यह किला अंग्रेजों के अधीन हो गया, किले के सामने लक्ष्मीनारायण और आदिनाथ के मंदिर बने हुए हैं। किले के भीतर दो तालाब हैं, एक तालाब को कपूर सागर के नाम से जाना जाता है।

काँगड़ा आर्ट गैलरी:-
यह आर्ट गैलरी काँगड़ा घाटी की कला, शिल्प और समृद्ध अतीत का भंडार है। यहाँ काँगड़ा की लोकप्रिय लघु पेंटिग्स, मूर्तियों का संग्रह और मिट्टी के बर्तन देखे जा सकते हैं।

महाराणा प्रताप सागर झील:-


यह झील व्यास नदी से बनी है। सन् 1960 ई॰ में व्यास नदी पर एक बांध बनवाया गया और इसे महाराणा प्रताप सागर झील कहा गया। इस झील का पानी 180 से 400 वर्ग कि॰मी॰ के क्षेत्र में फैला है। सन् 1983 ई॰ में इस झील को वन्यजीव अभ्यारण्य घोषित कर दिया गया। यहाँ लगभग 220 पक्षियों की प्रजातियाँ प्रवास करती हैं। इस बांध को पोंग बांध भी कहा जाता है।

खूबसूरत क्रिकेट मैदान:-


हिमाचल में विश्व का सबसे खूबसूरत क्रिकेट मैदान धर्मशाला में धौलाधार की गोद मे विराजमान है। ये कई सैलानियों के लिए आकर्षण का केंद्र है।

पर्यटन की अपार सम्भावनाएं:-

कांगड़ा में पर्यटन की अपार सम्भावनाएं हैं। यंहा बहुत से पर्यटक स्थल हैं जैसे
मैक्लोडगंज, पोंग डैम, त्रिउंड, पालमपुर, धर्मशाला तथा साथ ही धार्मिक पर्यटक स्थल।

इसके अलावा तिब्बत की निर्वासित सरकार भी यंही आश्रित है। धर्मगुरु दलाईलामा का पवित्र स्थान यंही विराजमान है। बौद्ध धर्मगुरु दलाई लामा के धर्मशाला में बसने के कारण धर्मशाला को ‘छोटा ल्हासा’ के नाम से भी जाना जाता है।

मुख्यालय: धर्मशाला
ऊंचाई: 1220 मीटर की दूरी पर
बोली जाने वाली भाषाएँ: कांगड़ी , हिन्दी और पंजाबी
पर्वतमाला : धौलाधार, शिवालिक
काँगड़ा में मुख्यतः तीन नदियाँ बहती है – ब्यास घाटी, बिन्नवा नदी, न्युगल
ब्यास नदी रोहतांग पास ,
बिन्नवा नदी बैजनाथ से निकलती है
रावी नदी बड़ा- भंगाल(जिला काँगड़ा) से निकलती है और चम्बा में बहती है।

काँगड़ा में डल, करेरी और पोंग जैसी प्राकृतिक झीलें हैं

महमूद गजनवी ने काँगड़ा पर 1009 इसवी पूर्व आक्रमण किया था

चाय प्रोसेसिंग फैक्टरी प्लांट बीर में है।

हिमाचल में काँगड़ा में सबसे ज्यादा चाय उत्पादित होती है

ग्रामीण जनसँख्या : 14,20,864
शहरी जनसँख्या :86,369
कुल जनसँख्या :15,10,075
पुरुष :7,50,591
महिलायें :7,59,484
लिंग अनुपात : 1012/1000(F/M)
जनसँख्या घनत्व : 263/km2

मुख्य धर्म :हिन्दू, मुस्लिम और सिख
बोली जाने वाली भाषा :पहाड़ी (कांगड़ी) ,हिंदी, पंजाबी
परम्परागत भोजन :मक्की, चावल, गेंहू
अर्थव्यवस्था : खेतीबाड़ी आधारित

संक्षिप्त इतिहास:-

ग्यारवीं शताब्दी में हिन्दू शाही वंश के शासक जयपाल की पूर्वी सीमा काँगड़ा था। सन् 1399 में तैमूर ने काँगड़ा पर आक्रमण किया था। जहाँगीर के समय 1620 ई॰ में काँगड़ा को मुगल साम्राज्य में जिला मिला लिया गया। उसके पश्चात काँगड़ा की स्थानीय राजपूत शैली और मुगल शैली से मिश्रित चित्रकारी की शैली विकसित हुई। 1785 ई॰ के पश्चात् संसारचंद व रणजीत सिंह का भी काँगड़ा पर अधिकार रहा। सन् 1966 के पंजाब पुनर्गठन के फलस्वरूप काँगड़ा को हिमाचल प्रदेश को सौंप दिया गया। 1 सितम्बर, 1972 को काँगड़ा जिला के तीन भाग कर ऊना, हमीरपुर, काँगड़ा जिलों का निर्माण किया गया।


पुराने समय मे इसे त्रिगर्त कहा जाता था।
त्रिगर्त के नाम से प्रसिद्ध काँगड़ा हिमाचल प्रदेश की प्राचीनतम रियासत है। महाभारत काल में इसकी स्थापना राजा सुशर्मा ने की थी। काँगड़ा को ‘त्रिगर्त’ के अलावा ‘नगरकोट’ के नाम से भी जाना जाता है। प्राचीनकाल में यह कटोच राजाओं का केन्द्र रहा। ये इलाका पंजाब के जालन्धर तक फैला था। महाभारत काल मे भी इसके बारे में लिखा गया है। त्रिगर्त के राजा सुशर्मा ने महाभारत में कौरवों की तरफ से युद्ध मे भाग लिया था।
1905 के भूकम्प में नगर बिल्कुल उजड़ गया था, तत्पश्चात्‌ नयी आबादी बसायी गयी। प्राचीन काल में त्रिगर्त नाम से विख्यात काँगड़ा हिमाचल की सबसे खूबसूरत घाटियों में एक है।

कुछ अन्य जिलों की जानकारी यंहा पढ़ें

कला की नगरी चम्बा/सामान्य ज्ञान

लाहौल स्पीति  स्वर्ग से भी सुंदर

हिमाचल के पर्यटन की जानकारी यंहा उपलब्ध है click here….

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लेखक परिचय:-

आशीष बहल

राष्ट्रीय स्तर के लेखक पेशे से अध्यापक
चुवाड़ी जिला चम्बा
हिमाचल प्रदेश

8 comments

  1. बहुत सुन्दर लेख कांगड़ा की विस्तृत जानकारी चित्रों सहित। आपकी कविता का वीडियो कमाल बधाई।

  2. बहुत सुंदर तथा ज्ञान बर्धक लेख के लिए वहल जी को बधाई एवं शुभकामनायें।

  3. आज पुनः लेख पढा और बहुत प्रसन्नता हुई। आपकी लेखनी से इतनी बढ़िया जानकारी.निकली है कि आप सतत बधाई के पात्र हैं
    सुरेश भारद्वाज निराश

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