भ्रमित इंसान

इंसान इंसान से दूर हुआ, मैं ही हूँ बस इक मैं ही ये भ्रम भी अब चूर हुआ,
नतमस्तक प्रकृति के आगे, इंसान बेचारा कितना मजबूर हुआ
पा लेगा सत्ता समस्त ब्रह्मांड की क्या धरती क्या अम्बर मंगल चन्द्र पर भी ये सवार हुआ
बंधा जब इक कमरे में ऐ खुदा तब इंसान का खत्म सारा गुरुर हुआ।।

ये करो ये करो ना करते करते फैल गया कोरोना, सीखा न अपनी गलती से ओर प्रकृति को बना डाला खिलौना
लेकर वापिस सत्ता अपनी चह चहा रहा है अम्बर सारा,
कह रहें है नभचर अब देख सारा आकाश है हमारा।।

पूछ रहे प्रकृति के प्यारे सारे, इंसान किस बात का तू घुमान करे, इक कीटाणु से लड़ने की औकाद नही, बातें नित नए विनाश की गढ़े
बच गया इस घड़ी में तो याद रख सफेद कोट में ब्रह्मा उतरे, खाकी में शिव ने ही तांडव दिखलाया
वख्स देंगे विष्णु भी गुनाह तेरे, जो छोड़ हट प्रकृति का तू पोषण करे।।

धर लो मन मे एक ध्येय सामाजिक दूरी का ध्यान करे, घर मे ही सुरक्षित हैं सब बच गए तो फिर जी भरकर भ्रमण करें
मास्क और ग्लब्स के बिना अब जीना मुश्किल हाथ न धोए बार बार तो जीवन पर है संकट
आओ मिलकर देशभक्ति का हम प्रमाण दें, दिखे जो भूखा कोई अन्न के साथ उसे सम्मान भी दें।।

आशीष बहल
चुवाड़ी जिला चम्बा