चम्बा का पारम्परिक हुनर चम्बा रुमाल

 भूमिका :–
भारत अपना 68 वा गणतंत्र दिवस मनाने जा रहा है। ये पल और ये दिन हर भारतवासी के लिए बहुत ही यादगार होता है जब भारत की विविधता में एकता को प्रकट करती कई झांकिया पेश की जाती हैं इस बार 26 जनवरी 2017 को गणतंत्र दिवस की परेड में एक बार फिर हिमाचल वासियों के लिए गौरवमयी क्षण होगा जब 26 जनवरी की झांकी में तीन साल बाद राजपथ पर हिमाचल की पारम्परिक कला और संस्कृति को पेश करती हुई ऐतिहासिक चम्बा रुमाल की झांकी पेश की जायेगी। इस बार प्रदेश भाषा कला एवं संस्कृति विभाग और विवि के विजुअल आर्ट विभाग के प्रोफेसर एवं आर्टिस्ट प्रो. हिम चटर्जी के विषय और मॉडल को केंद्रीय रक्षा मंत्रालय ने स्वीकार किया है।
हर वर्ष 26 जनवरी की परेड में देश के सभी राज्यों से अपनी संस्कृति की झलक दिखाती झांकियों को पेश किया जाता है जिससे देश के अन्य राज्य एक दूसरे की कला और संस्कृति से परिचित होते हैं तथा पुरे विश्व में भारत की विवध संस्कृति को पहचान मिलती है।पिछले तीन साल से हिमाचल की तरफ से पेश किये किसी भी मॉडल को राष्ट्रीय स्तर का न होने के कारण मंजूर नहीं किया गया। 2013 में हिमाचल की तरफ से जनजातीय जिले किन्नौर की शादी की परंपरा को दिखाती झांकी को राजपथ पर दर्शाया गया था। इस बार हिमाचल की तरफ से जिला चम्बा गणतंत्र दिवस के शुभ अवसर पर अपनी ऐतिहासिक विरासत,अद्भुत कला और संस्कृति की मिसाल पेश करते हुए चम्बा रुमाल के इतिहास जीवंत करेगा।

इतिहास:–
वैसे तो हिमाचल के पास कला संस्कृति की कोई कमी नहीं है पूरा हिमाचल अपनी समृद्ध संस्कृति के लिए जाना जाता है। हिमाचल की संस्कृति को हमेशा लोगो के दिलों में वसाए रखने में जिला चम्बा का अपना एक अहम योगदान रहा है। चम्बा रुमाल भी उनमें से एक है। आज जब चम्बा रुमाल को राष्ट्रीय स्तर की झांकी के लिए चुना गया है तो साथ ही इसकी पहचान अंतराष्ट्रीय स्तर पर और अधिक मजबूत होगी। जब चम्बा रुमाल के कारण एक बार फिर हिमाचल वासी खुद को गणतंत्र दिवस की परेड में गौरवान्वित महसूस करेंगे तो ऐसे समय में चम्बा रुमाल के गौरवमयी इतिहास को जानना तथा वर्तमान परिपेक्ष्य में चम्बा रुमाल की अलौकिक कला को समझना अत्यंत आवश्यक है। चम्बा रुमाल के बारे में लिखने और पढ़ने के लिए इतना कुछ है कि उसे किसी एक लेख में परिभाषित नहीं किया जा सकता फिर भी मुख्य बातों को लिखने का प्रयास किया है। चम्बा रुमाल की अद्भुत कशीदाकारी काफी प्राचीन है 16 वीं शताब्दी से भी पहले की ये कला चम्बा ही नहीं बल्कि आसपास भी काफी प्रसिद्ध थी शुरू में ये काँगड़ा , नूरपुर, मंडी और जम्मू के वासोहली में पहाड़ी चित्रकला के रूप में काफी प्रसिद्ध थी। पहाड़ी चित्रकला और शिल्पकला का चम्बा रुमाल एक अनूठा मिश्रण है।  ऐसा भी विश्वास है कि 16वीं शताब्दी  ‘बेबे नानकी’ जो कि गुरु नानक देव जी की बहन थी द्वारा गुरु नानक जी को भेंट किया गया रुमाल आज भी होशियार पुर के गुरूद्वारे में संरक्षित किया गया है जिसे कि चम्बा रुमाल की सबसे प्राचीन कृति के रूप में कुछ लोग मानते हैं।
17 वीं सदी में राजा पृथ्वी सिंह ने चम्बा रुमाल की कला को बहुत अधिक संवारा और रुमाल पर “दो रुखा टांका” कला शुरू की। राजा पृथ्वी सिंह ने महिलाओं के लिए शिक्षा के स्थान पर चम्बा रुमाल की कला को सीखना अनिवार्य किया गया तथा हर शुभ कार्य में चम्बा रुमाल भेंट करने की रस्म शुरू की जो आज भी प्रचलित है लोग आज भी विवाह आदि रस्मों में एक दूसरे को चम्बा रुमाल भेंट करते है यही कारण है कि आज भी ये कला लोगो के बीच में जिन्दा है।
18 वीं शताब्दी में चम्बा रुमाल का काम जोरो पर था। बहुत से कारीगर इस कला से जुड़े थे। उस समय के राजा उमेद सिंह ने इस कला को और कारीगरों को संरक्षण दिया तथा चम्बा रुमाल की कला को दूर तक पंहुचाया। लन्दन के विक्टोरिया अल्बर्ट म्यूजियम में रखा गया चम्बा का रुमाल इसके महान इतिहास के दर्शन करवाता है जिसे चम्बा के राजा गोपाल सिंह ने 1883 में ब्रिटिश सरकार के नुमाइंदों को भेंट किया था जिसमे कुरुक्षेत्र युद्ध की कृतियों को उकेरा गया है। 1911 में चम्बा के राजा भूरी सिंह के द्वारा भी इस हुनर को बहुत सम्मान दिया गया दिल्ली दरबार में ब्रिटिश सरकार को चम्बा रुमाल की कई कलाकृतियां भेंट की।

अद्भुत कला और कशीदाकारी :–

            चम्बा रुमाल अपने अद्भुत कला और शानदार कशीदाकारी के कारण निरन्तर प्रसिद्धि की नई इबारत लिखता गया। चम्बा रुमाल की कारीगरी मलमल , सिल्क के तथा कॉटन के कपड़ो पर की जाती है जो कि वर्गाकार तथा आयातकार होते हैं। कई प्रकार की कलाओं को इसमें अंकित किया जाता है जिसमे मुख्यतः श्री कृष्णलीला को बहुत ही सुंदर ढंग से रुमाल के ऊपर दोनों तरफ कढ़ाई करके उकेरा जाता है तथा साथ ही महाभारत युद्ध, गीत गोविन्द से लेकर कई मनमोहक दृश्यों को इसमें बड़ी ही संजीदगी के साथ बनाया जाता है। रुमाल पर खास तरह की कढ़ाई करने की इस कला का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पेटेंट करवाया गया है। रुमाल पर की गई कढ़ाई ऐसी होती है कि दोनों तरफ एक जैसी कढ़ाई के बेल बूटे बनकर उभरते हैं। यही इस रुमाल की खासियत है।

लोक संस्कृति में स्थान :–

यहां की लोक संस्कृति और गीतों में भी रुमाल की बात सुनने को मिलती है। लोकगीतों में ये लोकगीत
“राम लछमन चोपड़ खेलदे,
सिया रानी कडदी कसीदा”
काफी प्रसिद्ध है जो कि कई खास मौकों पर गाया जाता है।
लोगो के निजी जीवन व पारंम्परिक रीती रिवाजो में भी चम्बा रुमाल को अहम स्थान दिया जाता है चम्बा के लोग विवाह शादी के समय दूल्हे दुल्हन को शगुन स्वरूप चम्बा रुमाल भेंट करते हैं। पुराने समय में राजपरिवारों में भी चम्बा रुमाल को भेंट स्वरूप दिया जाता था यही कारण है कि चम्बा की पारम्परिक कला आज भी लोगो में उतनी अधिक प्रसिद्ध है।

विभिन्न व्यक्तित्व और सम्मान:–

चम्बा रुमाल को पहचान दिलाने के लिए बहुत से लोगो को हमेशा याद किया जाता है 1965 में चम्बा रुमाल के लिए पहला राष्ट्रीय पुरस्कार श्री मति माहेश्वरी जी को दिया गया इसके बाद कई लोगो को ये पुरस्कार मिले तथा इस प्राचीन कला को जीवंत रखा जिसमें मुख्य नाम पद्म श्री अवार्ड से सम्मानित विजय शर्मा जी, सोहन लाल, कमला नैयर, सराज बेगम, अमी चन्द, चिमि देवी, आनंद प्रकाश आदि का है।
इसमें बहुत बड़ा और अहम  योगदान श्री मति ललिता वकील जी का है जिन्हें 1993 में राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया तथा 2012 में राष्ट्रपति द्वारा शिल्प गुरु सम्मान से सम्मानित किया गया ये सम्मान पाने वाली ये इकलौती हिमचली हस्तशिल्पी हैं। श्री मति ललिता जी ने चम्बा रुमाल की हस्तकला को जीवित रखने तथा अन्य लोगो तक इसे पँहुचांने में विशेष योगदान दिया है। उन्होंने बहुत से लोगो को इस कला को सिखाया तथा दूर दूर तक चम्बा रुमाल की पहचान कराई तथा इस महान कला को संवारा सजाया और यही कारण है कि आज चम्बा रुमाल राजपथ पर अपनी चमक बिखेरने को तैयार है। इस  झांकी में चंबा चौगान, लोक गीत के साथ पांच साल पूर्व में मनाए गए एक हजार वर्ष के उपलक्ष्य में बनाए गेट को भी दिखाया जाएगा।

रोजगार में अवसर :—

आज बहुत से लोग इस खासकर महिलाएं इस कला को संजोने और सहजने में लगी हुई है। सरकार को चाहिए कि इस पुरानी कला को रोजगार क्षेत्र से जोड़े। आज चम्बा रुमाल की मांग और लोगो के बीच में पसन्द इस कदर बढ़ रही है कि चम्बा रुमाल 5 हजार से 50 हजार की कीमत तक बिकते है यदि हिमाचल सरकार द्वारा स्कूलों में वोकेशनल शिक्षा में चम्बा रुमाल के विषय को जोड़ा जाए तो ये अपने आप में एक बहुत ही बेहतर कदम होगा। इससे आने वाली पीढ़ी तक ये कला हस्तांतरित होगी और अद्भुत सांस्कृतिक विरासत को दीर्घकाल तक बचाया जा सकेगा। अतः हम सब मिलकर इस कला के प्रति अपना सम्मान दे और गणतंत्र दिवस की परेड में मिलकर अद्भुत पारम्परिक कला का स्वागत करें।

आशीष बहल चुवाड़ी जिला चम्बा
जे बी टी अध्यापक
लेखक और कवि
Ph 9736296410
Email.  ishunv0287@gmail.com