गजल
मुश्किल है मिलनी अब मुहब्बत जहां में,
क्योंकि रही ही नहीं अब अकीदत जहां में |
इतना गिर चुका है जमीरे इन्सान यहां,
के भली है बेजुबानों की सोबत जहां में |
भूल गए फराइज कुनबे और वतन के वास्ते,
लीक से हटकर बिक रही आदमियत जहां में |
नफरत को खत्म करें जो हैं इन्सान वही,
भर दे उल्फत ही उल्फत जहां में |
छोड़ कर चल दिये जो भी मिले हमसफ़र,
मिले हैं आप हमे बाद मुद्दत जहां में |
आज भी मेरे ख्यालों में सिर्फ तुम ही हो,
पूजा करुंगा रहेगी जब तक ईबादत जहां में |
होते ही हैं परवाने शमा में जल जाने को,
चैन से जीने की नहीं उन्हें मोहल्लत जहां में |
दिल सैरो सयाहत करना चाहता है जहां की सुधांशु,
मगर क्या करें नहीं अमनो अमां के हालत जहां में |
संजीव कुमार सुधांशु
गांव व डाकघर च्वाई
त. आनी जिला कुल्लू
हि. प्र.
172032.
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