खुदा कंहा बसता है
भगवान तू कण कण में बसता है,
दरिद्र,ब्राह्मण और शुद्र हर दिल में रहता है,
गरीब की झोंपडी और अमीरों के महलों में बसता है,
फिर क्यों मंदिर में बिछता संगमरमर और गरीब फुट पाथ पर जीता है।

है तेरी रहमत जब सब पर हे खुदा
तो क्यों कोई ऐशो आराम में तो कोई भूखा सोता है,
तू है सब जगह तू ही दरिया, तू ही समन्दर फिर क्यों कोई डूबा, तो कोई सुखा रहता है।

बदल दे अगर तू निगाहें अपनी तो कंहा कोई राजा और कंहा कोई रंक रहता है,
है सब तेरी ही संताने हर मन में तू वसता है तो फिर क्यों तू पत्थर में पूजा जाता है।

मर जाता है कोई दर पे तेरे भूखा प्यासा और खुदगर्ज इंसान तुझे पत्थर की मूरत में ढूंढता है,
कर दे रहमो कर्म अपना ए खुदा बता दे इंसान को कि खुदा कंही और नहीं हर इंसान के दिल मे रहता है।
क्यों ढूंढता है तू मंदिर-मस्जिद
कर मोहब्बत इंसा से क्योंकि प्रेम में ही तो खुदा बसता है,प्रेम में ही तो खुदा बसता है।

आशीष बहल
चुवाड़ी