हर बार दिल से मिलाता है आईना,
ज़िन्दगी की धूप छांव बताता है आईना ।

घर के आईने की कीमत कम हो जाती है ,
जब नया लाया जाता है आईना ।

खुशी को बांधोगे तो ग़म सरक जांएगे,
बक्त मे इंसा की पहचान कराता है आईना ।

माँ-बाप के ज़ज्बात की कदर न की तो,
बनोगे तुम भी मां-बाप बताता है आईना ।

फरेब से नही कटेगी जिंदगी ज़हां में ,
वार-वार यही समझाता है आईना ।

फल होता है मीठा सब्र का कहते हैं सब,
सच को कभी झूठ नहीं कहता है आईना ।

फितरत इसकी समझ न आई “दीक्षित”,
अपनी मरजी से चलाता है आईना।

सुदेश दीक्षित
पंडतेहड बैजनाथ
कांगडा हि प्र