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काली रात घनेरी भगवन।
अद्भुत् छठा बिखेरी भगवन।।

मन-मंदिर में घंटा बाजे।
है मिलने की देरी भगवन।।

उलझी उलझन सुलझ रही है।
देरी और सवेरी भगवन।।

तुमने पग-पग देखा-भाला।
मैंने ही की देरी भगवन।।

आज घड़ी भर देखा तुमको।
खुशियाँ दे दीं ढेरी भगवन।।

काला बादल छटता जाता।
दिखती सूरत तेरी भगवन।।

वीणा में झंकार हुई है।
आई आज दिलेरी भगवन।।

राग-द्वेष मिटे हैं सारे।
खोई हेराफेरी भगवन।।

आलोकित अज्ञान हुआ जी।
हर ली पीड़ घनेरी भगवन।।

सबको यह आभास हुआ पर।
टिकता थोड़ी देरी भगवन।।

आस ‘नवीन’ लिए फिरता हूँ।
और कहीं ना टेरी भगवन।।

नवीन शर्मा ‘नवीन’
गुलेर -काँगड़ा,
(हि०प्र०)
१७६०३३
?9780958743