कविता/सुरेश भारद्वाज

ऋतुराज

हे ऋतुराज ! तुम बसंत हो
अनंन्त हो तुम अनन्त हो,
माँ शारदे के सपूत तुम,
पीत बर्णीय संत हो,
बसंत हो तुम बसंत हो

तेरे आने से बागवां में,
कलियां खिलने लगीं,
चहुं ओर छाई हरियाली,
अंबिया है बौराने लगी।
कोयल लगी कूकने
आमों की डाली पर,
रंग बिरंगे पुष्प खिलकर,
नेह बरसायें माली पर,
फूल सरसों के खेतों में
चार चाँद लगा रहे,
बन उपबन की छठा को,
दिव्य रुप में सजा रहे।
चला गया पतझड़,
देख तुम्हारा आगमन,
कलियों का रुप निहारें
भंवरे करते गुंजन
ऋतु परिबर्तन हो गया
ऋतराज तुम्हारे आने से,
चहुं ओर फैली सुगन्ध
पवन के फैलाने से।

हे ऋतुराज तुम बसंत हो,
अनन्त हो तुम अनन्त हो।

*निराश* 😡
सुरेश भारद्वाज निराश
धौलाधार कलोनी लोअर बड़ोल
पी.ओ. दाड़ी (धर्मशाला) कांगड़ा हि..प्रः
176057
मो० 9418823654

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