#कोटखाई_की_दिवंगत_गुड़िया_को_समर्पित
#गुड़िया_हम_शर्मिंदा_हैं_तेरे_कातिल_अभी_जिंदा_हैं।
बता गुड़िया तूने देवभूमि में जन्म लिया था।
शायद पिछले जन्म, अच्छा कर्म किया था।।

5 साल पालपोस माँ बाप ने बड़ा किया था।
स्कूल भेजा जब तूने थोड़ा होश लिया था।।

गुड़िया पढ़ते पढ़ते 10वीं तक पहुँच गई थी।
पढ़कर कुछ नाम करेगी मम्मी सोच रही थी।।

किसको पता गुड़िया ऐसा भी दिन आना था।
जिस दिन तूने दंरिदों के हाथों नोचे जाना था।।

स्कूल से शायद उस दिन भी घर निकली थी।
दंरिदों की गैंग तुझे रास्ते से उठा निकली थी।।

ऐसा ना मेरे साथ तू भी हाथ जोड़ती रही थी।
पता है मुझे भी तब कितनी तूने दर्द सही थी।।

हवशी दंरिदों ने सभी हदों को तोड़ दिया था।
पता है कि तब तक तो तूने दम तोड़ दिया था।।

दूसरे दिन जब बाजार में अखबार आई थी।
शर्मसार हुई देवभूमि ऐसा समाचार लाई थी।

देख खबर लोगों का थोड़ा गुस्सा जाग गया।
पुलिस क्या राजा भी जिम्मेदारी से भाग गया।।

दिया बयान कुछ ऐसा आमजन लाचार हो गया।
भड़क विरोध की चिंगारी, थाने पे प्रहार हो गया।।

हर तरफ से देवभूमि को बस बदनामी मिली थी।
15 दिनों में भी सरकार को नाकामी मिली थी।।

पकड़े गए थे जो कुछ तुझे मौत देने वाले दंरिदे।
उनमें से थे कुछ रसूखदारों के चमचे और करिंदे।।

एक दरिंदे को तो पुलिस हिरासत में ही मार दिया।
विरोध बाकी है खुदा ने अभी नहीं इन्साफ किया।।

अभी “रविन्द्र कुमार अत्री” की कलम रुकी नहीं है।