तीर चलते रहे,
फर बदलते रहे।
रूप धर कर नया,
लोग छलते रहे।।

कुछ मिले प्यार से,
सूक्ष्म तलवार से।
गरल-पुष्प हार से,
बेवजह खलते रहे।।

वीत राग भय क्रोध,
जटिलतायें सुबोध।
आह्लादित अबोध,
मस्त मचलते रहे।।

क्या तकरार गिले,
लव रह गए सिले।
नेह की विजय हुई,
धूल में मिलते रहे।।

एकाकी भीड़ में,
भीड़ बड़ी नीड़ में।
माया के द्वंद्व में,
पुष्प खिलते रहे।।

कौन परेशान है?
घोर अपमान है।
व्याह अद्वैत से,
सुर सँभलते रहे।।

नवीन शर्मा ‘नवीन’
गुलेर, कांगड़ा (हि०प्र०)
१७६०३३
?9780958743
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