नाज़ुक समां
एसा नाज़ुक समां आ गया
माँ -बाप औल्लाद से डरने लगे
मौत आये जब भी आये
वो बिन मौत ही मरने लगे।
सपने बड़े संजोये थे
वक्त के धागे में पिरोये थे
रुठ गया वो वक्त भी अब
सपने सब विखरने लगे।

पाल पोस कर बड़े किये
यौवन के पल उन्हें दिये
एक पल न भूले जिनको
माँ-बाप उन्हें विसरने लगे।

अच्छी लगे न बात उनकी
मन को न भाये गात उनकी
हरदम जिनको दिल में वसाया
उनके दिल से उतरने लगे।

बदल गया जमाना कितना
सोचा नहीं था शायद इतना
टक टक देखें बूढ़ी आँखें
आँसू उनमें विचरने लगे।

दहाड़ें जब वो बात करें
गहरे भीतर आघात करें
इज्जत -मान कौन पूछे
दिया जो उससे मुकरने लगे

बृद्धाश्रम की राहों तक
दर्द से लेकर आहों तक
सब कुछ देकर विदा किया
अब लोग ही पुकरने लगे।

भूली विसरी यादों को
बचपन की फरियादों को
बसाकर हम अपने दिल में
मर मर कर उभरने लगे।

बड़ी सजा है माँ बाप होना
चाहे कौन रिश्तों को ढोना
ढीली पड़ गयी डोर वन्धन की
वोह डोर को ही कुतरने लगे।

दिल की लगी किसे दिखायें
दर्द न जाने कैसे दिखलायें
टूटी हुई कश्ती में हम
निराश पार उतरने लगे।

सुरेश भारद्वाज निराश
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