ग़ज़ल /हिंदी
कैसे अपनी दोस्ती निभ पाए पैमाना कहाँ है ,
आज रान्झू हीर का वो प्यारा अफ़साना कहाँ है I

प्यार से ही जो बदल दे हर अदावत की फ़जा को,
संत मुर्शिद सूफ़ी मौल़ा ऐसा मस्ताना कहाँ हैI

ख़ुद गरज नेता वतन का क्या करेंगे वो भला जो,
मार हक़ फिर देखते हैं उनका नजराना कहाँ हैI

अंजुमन में रिन्दों की खुद बैठ कर जो देखा हमने,
हाल पूछें वो सभी का कोई अनजाना कहाँ हैI

हर ख़ुशी कुर्बान कर दे खुद वतन के वास्ते जो,
पासवां सरहद का ऐसा और परवाना कहाँ हैI

बाँट दे मज़हव भले ही इंसान को ही टोलियाँ में,
थाम ले गिरते हुए को वो तो बेगाना कहाँ हैI

है इनायत जिस की हर दम और चारों ओर’कंवर’,
ढूंढ लें दैर-ओ-हरम भी उसका दीवाना कहाँ है I

डॉ . कंवर करतार
‘शैल निकेत ‘
अप्पर बड़ोल धर्मशाला I
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