माँ पर लिखूँ
रचना नई कोई
विबाद नहीं।।
देखो कितना
सहती रहती है
हिसाब नहीं।।

माँ अहसास
अराधना पूजा है
बवाल नहीं।।

जिसकी मति
मारी उससे कभी
सवाल नहीं।।

माँ की ममता
कितनी न्यारी है
हिसाब नहीं।।

गिले में सोती
शिकायत न होती
लोरी सुनाती।।

सब मान लें
माँ को पहचान लें
न मारें ताना ।।

माँ की पूजा से
बडा तीर्थ धाम
न आज कोई।।

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2
गैर याद आये अपनों को भूल कर।
लालच में खोये सपनों को भूलकर।।

नियत कितनी माड़ी हो गई देखिये।
लाशें बेच रहे कफनों को भूलकर।।

मरह़म की उम्मीद कैसे करूँ उससे।
पीटा जिसने सदा जख़्मों को भूलकर।।

मिलावट से बचा नहीं कुछ भी अब
खाते हैं रोटी अभी मखनों को भूलकर।।

काम चला रहे कागज की प्लेटों से।
काँसे पीतल के बर्तनों को भूलकर।।

शराब पिलाना रिवाज़ खास हो गया।
पिला रहे, जग्गू, खतरों को भूलकर।।

3
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गैर को मनायें क्या अपने भी तो पराये है
छीन लिया बजूद मेरा सपने हैं या साये हैं।

कर पहरा दिन रात वोह पहरी क्या कर पाये हैं
खेत खा गये बन्दर जब मालिक क्या रुलाये हैं।।

भूल गये वायदे सारे क्या कह कर सत्ता पाये हैं,
देख तेवर दाँतो तले उंगली क्या दवाये हैं।।

दर फरियाद सुनी नहीं क्या न्याय कर पाये हैं,
अपना अपना कह कर देखो क्या कहर ढाये हैं।।

गौरख धन्धे जहाँ चलते क्या विकास हो पाये हैं
जालिम दुनिया ने पाल कर ,जग्गू, वकरे खाये हैं।।
जग्गू नोरिया
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