कविता/राम भगत नेगी

….प्रेम की भाषा ..
प्रेम का शब्द दो अक्षर
जोड़ता पूरा समाज को है

प्रेम बड़ा या छोटा नहीं
सौच बड़ा या छोटा हो सकता है

प्रेम जोड़ता है
प्रेम तोड़ता नहीं प्रेम विशवाश है

प्रेम से दुनियां के दिल में जगह है
प्रेम से दुनियां आपके कदमों में

प्रेम अपनों से हो
या पराये से प्रेम से रिश्ता जुड़े

प्रेम से घर बने दिल जुड़े
प्रेम से समाज जुड़े

दुनियां की ताकत प्रेम है
प्रेम है तो दुनियां आपकी

प्रेम कोई जात नहीं धर्म नहीं
प्रेम सभी ग्रंथों की परिभाषा है

प्रेम मीरा है राधा है
प्रेम सिर सागर है

प्रेम सतरंगी इन्द्र धनुष है
प्रेम निर्मल गँगा जल है

प्रेम से दोस्ती भी
प्रेम से दोस्त भी

प्रभु प्रेम माँ बाप का प्रेम
या भाई बहन या प्रेमिका का प्रेम

बस प्रेम से बड़ा न कोई है
प्रेम से बड़ा न कोई होगा

राम भगत

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