क्या तुम वही हो/राम भगत नेगी

..क्या तुम वही हो…..
क्या तुम वही हो
जो अचानक मेरे दिल मे
हर वक़्त हलचल मचाते थे

तुम अंधकार में प्रकाश थी
जीवन की उड़ान की आकाश थी

तुम मुधुर मुस्कान की मूर्ति की देवी थी
तुम मेरे विश्वास के तरुण रूपी सागर थी

आज तुम सिर्फ दिखावा रूपी मूर्ति हो
दर्द जख्म से कोई मतलब नहीं है तुम को

दुर की नहीं तुम आज की सोचती हो
तुम सिर्फ अपने दिल की सोचती हो

मेरे मन मंदिर में तुम्हारी तस्वीर बसी है
हर वक़्त खयालो मे आज भी रहता हूँ

क्या तुम वही हो
जो मेरे मन मंदिर की आवाज़
बिना बोले सुनते थे

मुझे नहीं लगता तुम वही हो
क्यू कि तुमने अब विश्वास यकीन ऐतबार भरोसा
मुझ पर अब करना छोड़ दिया है

और आज फ़िर में तनहाइयां में जी रहा हूँ
अकेला खामोश सुनसान रातों में
फ़िर से चाँदनी रात का इंतजार कर रहा हूँ

राम भगत

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