शीर्षक (अंधों में काना राजा)
जनता बेचारी असमंजस में है पड़ी, नेता राग रंग में मस्त हैं।
अधिकारी रिश्वत में खोए पड़े, गरीब महंगाई से बड़े त्रस्त हैं।
देश सारा मानों आज, रिश्वत की महामारी से ग्रस्त है।
मंझधार में है नौका फंसी, खेवनहार ही नतमस्त है।
लोकतंत्र में मौज ही मौज है, हरेक लूट ही लूट में व्यस्त है।
बाड़ ही खेत खाए जा रहा, भगवान् ही इस देश का रक्ष है।
बेईमानी का है बोलबाला, ईमानदार देश पीड़ा से ग्रस्त है।
झूठ से यहां काम चलता, सच्चाई तो फाईलों में यहां ध्वस्त है।
इन्सान हैवान है यहाँ बन गया, इन्सानियत यहां लुट रही।
फल फूलती चोरी यारी-लूट मारी, शराफत घुट घुट कर मर रही।
नेता सत्ता के नशे में चूर हो कर, स्वार्थ में हो रहे मदमस्त हैं।
जिधर देखो उधर ही, नेताओं की करतूतों की चर्चा हो रही।
जानते हुए भी सर्वस्व, हर जगह जनता बेचारी है लुट रही।
पांच वर्ष का इंतजार करते करते, चुनाव का इंतजार कर रही।
परिमल जाने अगले चुनाव में भी, क्या दाव नेता लगाएंगे।
मजबूर जनता अंधों में काना राजा, चुनने की प्रतीक्षा है कर रही।
नंदकिशोर परिमल, गांव व डा. गुलेर
तह. देहरा, जिला. कांगड़ा (हि_प्र)
पिन. 176033, संपर्क. 9418187358
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