कविता नारी/नंद किशोर परिमल

शीर्षक (नारी)
नारी तो नारी ही है होती, किसी की मां तो किसी की है बेटी होती।
किसी की बहिन तो किसी की है पत्नी होती।
नारी की हैसियत इस जग में सब से है बड़ी होती।
नारी तो जज्बा है प्यार का और त्याग का।
इसमें भरा दर्द है पूरे संसार का।।
यह कभी बेकार न बैठे, हर पल का सदुपयोग है करती।
इक क्षण आराम करे न, हर पल है व्यस्त रहती।
जिस जिसने इस जग में औरत का मोल न जाना।
उसका इस जग में नहीं है कोई ठिकाना।
भारत की नारी मोहताज नहीं किसी की, पुरातन काल से ही नया इतिहास बनाती आई।
जितनी कोमलांगी है वह, उतनी क्रूर बन कर रण में दुश्मन को दहाड़ती आई।
कभी सीता तो कभी सावित्री और कभी आहिल्या कहलाई।
जब संकट आन पड़े भारत पर, झांसी की रानी बन कर आई।
सर्वोपरी दर्जा देकर नारी का कर्ज चुकाओ। परिमल मान करो नारी का और अपना फर्ज़ निभाओ।।
नंदकिशोर परिमल, गांव व डा. गुलेर
तह. देहरा, जिला. कांगड़ा (हि_प्र)
पिन. 176033, संपर्क, 9418187358
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