ग़ज़ल
बता कौन अपना सहारा शहर में
मैं कैसे फिरुँ मारा मारा शहर में

चलो लौट जायें उसी गाँव में हम
नहीं होगा अव यूँ गुज़ारा शहर में

यूँ अपने में ही सब चले जा रहे हैं
किसी ने न हमको पुकारा शहर में

सभी खाव अपने अधूरे यहां हैं
मिला है न कोई हमारा शहर में

ये समुद्र है इसमें यूँ हम खो गये हैं
मिला आज तक ना किनारा शहर में

नज़र में यूँ सबकी रहा अजनवी मै
है सबने मुझे मिल के मारा शहर में

यहां देखता हूँ वो लुटती सी दुनियाँ
है किस को शहर ने सुधारा शहर में

यूँ मैखाने में तेरे हम थे लुटे जो
न आयेंगे फिर हम दोवारा शहर में

रहे खेल बहनों की ईज्जत से बहशी
यहां खून सबका है खारा शहर में

जने वेटियाँ जो है माँ क्यूँ वो पापी
चली आज कैसी ये धारा शहर में

रहे चुन वो बच्चे यूँ कचरे में रोटी
है देखा ये कैसा नजारा शहर में

पड़ोसी पड़ोसी गले कब मिलेंगे
है कैसा मकाँ ये हमारा शहर में

“निराश” कहां तक खपोगे यहां तुम
किसी ने न हमको उवारा शहर में

सुरेश भारद्वाज निराश
धर्मशाला हिप्र