सुनो! जा रहे हो तुम/डॉ सुलक्षणा

सुनो! जा रहे हो तुम,
जाते हुए अपनी यादों को,
एक थैले में भर ले जाना।

और हाँ ले जाना तोहफों को,
समेट लेना इन्हें भी तुम,
एक पल को भी नहीं शर्माना।

अरे! मैं तो भूल ही गयी,
तुम क्यों शर्माओगे,
तुम तो बिल्कुल बेशर्म हो।

तभी तो जा रहे हो तुम,
मुझे यहाँ तन्हा छोड़कर,
बेवफा से थोड़े ही ना कम हो।

पर जाते जाते ये अहसान करना,
ले जाना अपने संग तुम,
मेरी साँसों में घुली अपनी खुशबू को।

दिल में समाई मोहब्बत को,
आँखों में बसी अपनी तस्वीर को,
ले जाना अपने संग मेरी इस जुस्तजू को।

उन गलियों को, उन चौराहों को,
नदी के उन किनारों को,
बस इतना कहते जाना तुम।

जब कभी गुजरे वो (मैं)
भूले से इन्हीं राहों से अकेले,
उस वक़्त ना याद दिलाना तुम।

मेरी भी हर चीज लौटाकर जाना,
कहीं तेरे इंतजार में बिताया हर लम्हा,
लौटाना ही भूल जाओ तुम।

और चाहे कुछ मत लौटना तुम,
बस मेरी वो पाक मोहब्बत लौटा देना,
ये मत कहना “सुलक्षणा” इसे छोड़ जाओ तुम।

©® डॉ सुलक्षणा

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