पहाड़ी कविता/जग्गू नोरिया

काँगड़ी

बुरे हाल लोकाँ दे,
चोर चक्के हथ मारदे,
राज होये जालू डरपोकाँ दे,
सरकारी जमीन टप्परू बनाये,
पीन्दे खून शरीफाँ दे ,
जुर्म इतने इन्हां कित्ते,
टव्वर शरमा गये जोकाँ दे,
कोई करदा रश्ते बन्द शमशाना दे,
कोई जमांदा हक सरकारी पाईप
गाडर कने पोलाँ ते,
पुट्टी सट्टे नल सरकारी इकनी,
मैं मैंं तूँ तूँ रोज होंदी सरीकाँ ते,
सरकारी महकमे खड़े खड़े डरदे,
टुल्लु पम्प लगे घर हकीमाँ दे,
समाजे दे कमाँ बिच रोड़ा पाँदे,
नागपाश बने सरकारी जमीनाँ ते,
लोभ लालच भरोआ खुरियाँ तिकर,
खाई गिया घराटी पीण गरीवाँ दे,
मनरेगा च लगदी त्याड़ी,
कम करदे पंचाँ दियाँ जमीनाँ दे,
बनी बैठे विकासे दे मसीहे,
रोजगार ब तकनीकी सैहक,
मुँह उतरे दिख्खे पंच प्रधाने दे,
कुसदियाँ क्या शक्तियाँ
कुसी जो खवर नीं है अज,
सैक्टरी हो गये ड्रैवर,
लुट मचाने बाली मशीनाँ दे,
एह अग भड़कियो हर जगह,
तरक्कया दे राह मुकाई सट्टे,
विकास अधिकारियाँ दे करिंदया रे,
पूछदा कोई हसाव नी इन्हाँ ते,
सोई गये लगदा सब,जग्गूा
जेहड़ा चोर चोर रौला पाँदे थे

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