निभा लेता हूँ मैं

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आँख नम रहतीं हैं, फ़िर भी मुस्कुरा देता हूँ मैं ।
मुस्कुरा कर दर्द को,अपना बना लेता हूँ मैं।।

जादुई दुनिया का जादूगर, हमें दिखता नहीं।
इसलिए हर दर पे अपना, सर झुका लेता हूँ मैं।।

रुख़ बदल जाये हवा का, थोड़ा थम जाये तुफ़ाँ।
हँस के खामोशी में सब, रिश्ते निभा लेता हूँ मैं।।

नेंमतों से इस कदर तूँने, नवाजा है मुझे।
इसलिए दिल खोल तुझको ही दिखा देता हूँ मैं।।

हड्डियाँ दिल में कहाँ, जो टूटने पे शोर हो।
ग़म को दावत के लिए दिल का पता देता हूँ मैं।।

लोग कहते हैं तेरा चेहरा, ‘अनिल’ क्यूँ श्याह है।
क्या बताऊँ दिल लगी, दिल में बुझा लेता हूँ मैं।।

?पंडित अनिल?
स्वरचित, मौलिक ,अप्रकाशित
अहमदनगर, महाराष्ट्र
8968361211

जब चाहा नारी नें

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घर सुघर बना दिया,जब चाहा नारी नें।
घर खंडहर बना दिया,जब चाहा नारी नें।।

राम को बनबास किसनें था दिया।
युद्ध महाभारत खड़ा किसनें,किया।।
ज्ञान से हरा दिया,जब चाहा नारी नें।
घर••••

गार्गी लोपामुद्रा नें कद बढ़ाया।
लक्ष्मीबाई नें चंडी बन दिखाया।।
किसको नहीं डरा दिया जब चाहा नारी ने।
घर••••••••••

घर सजाये तो उतारे स्वर्ग सारा।
बन कहाँ पाया जिसे इसनें उजाड़ा।।
कौन सा है रूप जो धारा न नारी नें।
घर••••••••

प्रेम श्रद्धा अश्रु वैभव का ख़ज़ाना।
इनके तप का सादग़ी का हर जमाना।।
वर अमर बना दिया जब चाहा नारी नें।
घर सुघर बना दिया जब चाहा ••।।

पंडित अनिल
स्वरचित, मौलिक, अप्रकाशित
अहमदनगर , महाराष्ट्र