सोचता हूँ देखकर
दिनभर की इठलाती दुनिया को ,,,

न थकान न आराम
न कोई ठिकाना
न अपनापन
न अपनाने की चाह
न कोई मंजिल
न कोई राह ,,,,,,,

हर जिंदगी चले हर कदम पर
हर कदम जिंदगी के सफ़र पर
न मंजिल मिलती है न हमसफ़र ……

किसे समझू मैं अपना किसे समझू मैं बेगाना
यहाँ सब घात लगाये बैठे हैं
कंही हर राह आसान तो
कंही शूल बिछाये बैठे हैं …..

खो चुकी है
इंसानियत
जो हाथ चलते थे पैरो पर वो हाथ आज गलो को दबाने लगे ……

वो फूलो की कलियाँ
खिलने का अहसास करती हैं ।।।

अनिल कुमार
गांव नाल डाकघर तीसा
तहसिल चुराह जिला चम्बा हिमाचल प्रदेश