क्यूं आखिर क्यूं/सुरेश भारद्वाज निराश

क्यूं आखिर क्यूं*?

मुस्कराना ही जीवन था
तो पैदा होते ही क्यूं रोये थे
सब खुदा की मर्जी से ही होना था
तो सपने क्यूं संजोये थे।

अरे ओ बादलों ! वरसना नहीं था अगर
तो सूरज को ढक कर क्या मिला
अपनी नीयत पर गयी नहीं नज़र
गैरों से करते रहे सदैव गिला।

आँधियां दिल में उठीं कोई अब कैसे जिये
पाँव के छाले फटने लगे, जलने लगे
मानवता की सोच किसको और किसलिए
जख्म होकर नासूर अब सीने में पलने लगे।

क्या करें कैसे करें और किसके लिये यहाँ
अपना तो नज़र न आये सब मिले गैर बनकर
शमशान् की दहलीज पर धो डाली अस्थियाँ
सीने में खंजर चुभोया आज सबने मिलकर।

घर कहे आँगन से अब तेरा जमाना लद गया
दरो दीवार आ गयी अब तो तेरे सामने
पड़ोसी को पड़ोसी न जाने वक्त कैसा आ गया।
अपने अपने दु:ख दर्द लगे हैं सब थामने।

दिन के उजाले में की थी रोशनी क्यूं हमने
क्यूं हमारे दर्द का हमदर्द हमें मिला नहीं
जलीं वोही बस्तियाँ जो बसाईं थीं निराश हमने
हमारा घर भी जल गया हमें कोई गिला नहीं नहीं।
सुरेश भारद्वाज निराश

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