🌹क्यूँ है 🌹

नाराजगी कैसी, निराशा क्यूँ है।
ज़िंदगी तुझसे, सुखद आशा क्यूँ है।।

हमनें दास्ताँ बस,यूँ ही सुनाई थी।
पर आँख तुम्हारा,भरा सा क्यूँ है।।

दिल बच्चा है,चाहिये ख़ुशियाँ ।
हाक़िम सयाना,देता जरा सा क्यूँ है।।

समंदर बेवजह ,हैरान है देखे।
सफ़ीना काग़ज़ का,ठहरा सा क्यूँ है।।

लोग मुस्कुरा कर,पूछ लेते हैं।
जख्म कैसा है, ये ,हरा सा क्यूँ है।।

नाज़ नखरे सिकंदर,दर अनिल।
सब का सब,यहाँ धरा सा क्यूँ है।।

पंडित अनिल

अहमदनगर, महाराष्ट्र
8968361211