गाँव से दूर/सुरेश भारद्वाज निराश

गाँव से दूर

हम यहां अजीव से शहर में आ गये हैं
सुखी जीवन छोड़ कहर में समा गये है।

सुन्दर सा गाँव था घर था जमीन थी
पहाड़ियों से घिरी वादी वो हसीन थी
शान्ति थी सकून था दर्द था न रोग थे
भोले भाले सीधे सादे वो सारे लोग थे
उम्मीद न थी जो यहां हम पा गये है
हम यहां अजीव से शहर में आ गये है ।

यहाँ तो कोई आता नहीं जाता नही
अपने में ही जी रहे किसी से नाता नहीं
घिरे हैं सब यहां चारदिवारी से
अन्दर ही अंदर जूझ रहे विमारी से
चेहरे सबके प्रदूषण से मुर्झा गये है
हम यहां अजीव से शहर में आ गये हैं।

कुआं नहीं यहां कोई बौड़ी नहीं
तंग हाल सड़कें खुली नहीं चौड़ी नहीं
गुम हो गया है मेरा खुला आसमां
क्या करें एसे में हम जायें कहां
खुद ही खुद को हम खा गये है
हम अजीव से शहर में आ गये हैं।

यहां कोई किसी का पड़ोसी नहीं
जुर्म बहुत हैं पर कोई भी दोषी नहीं
कुत्तों की है हर गली भरमार यहां
गऊ माता फिर रहीं हैं लाचार यहां
कर्मों से अपने हम शरमा गये हैं
हम अजीव से शहर में आ गये है

मेरा घर, दूर रह गया वो मेरा गाँव
छूट चुकी है पीपल की ठण्डी छाँव
यह गाड़ियों की टीं टीं और पौं पौं
आ रहा है याद “निराश” मेरा गौंअ
अपनी लाचारी से हम घवरा गये है
हम अजीव से शहर में आ गये है।
हम अजीव से शहर में आ गये हैं।

सुरेश भारद्वाज निराश
धौलाधार कलोनी लोअर बड़ोल
पीओ दाड़ी धर्मशाला हि प्र 176057
मो० 9418823654

One comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *