अचंभित हैं

हालात कुछ युँ दिख रहे हैं,
सरकारी नौकर नित नई
गाथा लिख रहे हैं।
कभी नकदी लेकर तो कभी
मट़न मश़लम शराब संग
बिक रहे हैं।
नौकर होकर मालिक बन
बैठे,
काम चोर हर दफ्तर दिख रहे हैं।
कहीं बस खाली रहती,
सवारी नहीं वैठाते ,
समझ नहीं आता ,
पैसे किस काम के उन्हें मिल रहे हैं।
सरकार से बड़े वे बन बैठे हैं,
मानो वे नेताओं से मिल रहे हैं।
अगर ऐसा नहीं है तो यह नौकर
जनता को क्यों निडरता से
पिस रहे हैं।
कहते बड़े बूढे जो शेष बचे हैं,
ऐसे नौकर से तो वे अंग्रेज़ भले थे।
कानून का डर था, कर्म का ही फल था।
हेक़ड़ी किसी की चलती न थी,
जनता गैर कार्य करती न थी।
आज आजाद क्या हुए,
रक्षक ही भ़क्षक और प़हरेदार
लुटेरे से मिल रहे हैं,
बैंक कंग़ाल लुटेरे माला माल
और ग्राहक कटौती देख चिड़ रहे हैं,
समझे किस रूप को कि दिन
किस द्शा में फिर रहे हैं।
जगाने बालों पर हमले हो रहे हैं,
जो जागे थे नींद से कहीं ,
वोह देख नियत गुनाह़गारों की,
सोने की सलाह देते दिख रहे हैं,
क्या से क्या बना देते हैं
समाज के दुश्मन,
अपनों के राज में अपने ही पिस रहे हैं,
जिस तरह बहने लगी है लूट की हवा,
लगता है क्राँति के बीज ,,जग्गू,,
कहीं न कहीं अंकुरित होने बाले हैं।।

जग्गू नोरिया