मैं कविता हूँ

मैं कोमल सुन्दर कविता हूँ,
कुसुमित चारु पुष्पलता हूँ।
प्रकृति की अनुपम बेटी हूँ,
कविकुल की निर्मित सत्ता हूँ।।

मधुर मलय के बेगों से,
अंतर्मन के सम्बेगों से।
प्रयत्नों से उद्वेगों से,
कवि मेरा रूप रचाता है।।

शृंगार वीर और हास्य रस,
मेरे अंतस्थल में भरे हुए।
हर रस सा रूप बनाती हूँ,
है परम् प्रिय मुझको करुण रस।।

मुझे कविता कामिनी कहते हैं,
अलंकार मेरे आभूषण हैं।
शब्द अर्थ द्वय हैं अंग प्रत्यंग,
सकल छंद मेरे सहचर हैं।।

सरल शब्दावली प्रिय मुझे,
मृदुभावों की अनुरागी हूँ।
मन में हूँ रहस्य छुपाये हुए,
मुग्धा की भांति लजाती हूँ।।

जब धरती पर नवकर्म हुआ,
तब तब ही मेरा जन्म हुआ।
प्रतिमन मेरा नवरूप बना,
तत्क्षण ही मैने मर्म छुआ।।

मैं भावना जगा देती हूँ,
नवचेतना जगा सकती हूँ।
मैं कामना जगा पाती हूँ,
सम्वेदना जता सकती हूँ।।

सरस् हृदय में वास मेरा,
नीरस में न विश्वास मेरा।
पत्थर मन में न उतरूँ मैं,
जो करें बृथा उपहास मेरा।।

अनुनय है तात व जननी से
है विनती लेखनी भगिनी से।
मेरे उर में अमृत प्राण भरें
‘भूषण’मुझे शाश्वत सत्य करें।।

मौलिक/अप्रकाशित

कुलभूषण व्यास
अनाडेल शिमला
हिमाचल प्रदेश
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