कुथू गैऐ सैह् धिआड़े)
सैह् धिआड़े कुथू गैऐ, दरियाएं गाह्णे जांदे थे।
सिआल़ा जाह्लु औंदा था, जाई छाड़ां पांदे थे।
घराटैं जाई न्नैं दाणे पियाणा जाणा,
वरसाती ताईं बतरीणां पिआई रखांदे थे।
दरियाएं जाई न्नैं कपड़े धोणे,
मिल बैठी ओथू रोटियां खांदे थे।
गर्मियां रे दिन पक्खे कुथू थे,
बांसे री पक्खियां न्नैं हवा झलोंदे थे।
फसलां बाह्णें ताईं ट्रैक्टर कुथू थे,
हल़ बैल जाई जतोंदे थे।
दाणे कड्डणे आल़ी मसीनां नीं थियां,
पुरवाईया ताईं बैई बैई बसौंदे थे।
दाणेयां ताईं ढोल नीं थे होंदे,
पेड़ूआं जाई न्नैं दाणे पांदे थे।
छीछा रेड़ू स्वाद था होंदा,
रोटी छल्लियां री सागे सौगी खांदे थे।
गर्मियां च् भटूरू रोज थे बणदे,
चाटियां पाई पाई न्नैं रखदे थे।
इक दूजे न्नैं लड़दे नीं थे,प्रेम पिआरें रैंह्दे थे।
परिमल सैह् दिन छैल बड़े थे,
रल़ी मिल़ी सारे रैंह्दे थे।
इक दूए न्नैं भेद भरम न कोई,
सारे सुखे रिया निंदरा सौदे थे।
नंद किशोर परिमल, से. नि. प्रधानाचार्य
गांव व डा, गुलेर, तह. देहरा (कांगड़ा) हि. प्र.
पिन, 176033, संपर्क. 9418187358