ग़ज़ल
212 212 212 212

आदमी आदमी को दगा दे गया
आदमी को बड़ी वो सज़ा दे गया

टूटा बंधन जो तेरा कभी वेवफा
तो खुदा भी समझ है रज़ा दे गया

पाप ढोता रहा तू यहां उम्र भर
बोही जीने की तुझको कज़ा दे गया

काम तेरे ही तुझको न अच्छे लगे
वक्त बदला तो कितना मजा दे गया

साथ छूटा जो अपना तो एसा लगा
कोई कैसी हमें भी सज़ा दे गया

पत्थरों के बुतों पर झुकाते हैं सर
जिनको पूजा न वो भी सदा दे गया

जख्म एसे मिले हैं कि हम क्या कहें
दर्द ही जीने की अब अदा दे गया।

सुरेश भारद्वाज निराश
धौलाधार कलोनी लोअर बड़ोल
पीओ दाड़ी धर्मशाला हिप्र 176057
मो.. 9805385225