इंकार क्यूँ है/पंडित अनिल

इंकार क्यूँ है

ज़िंदगी में जीत क्यूँ है••••हार क्यूँ है ।
मेरे प्रियतम बोलो ना , तकरार क्यूँ है।।

जीत कर भी मैं तुम्हारी, तुम हमारे हो।
बोलो ना इक़रार में••••इंकार क्यूँ है।।

मैं चलूँ तन्हा न तन्हा,तुम चलो साथी।
ग़म हमारी ख़ुशियों में, हक़दार क्यूँ है।।

बाँट लेंगे जो दिया, रब ने हमें है ।
मुस्कुरायें चल,ग़मे ग़ुब्बार क्यूँ है।।

सुप्रभातम्

पं अनिल

मौलिक,स्वरचित, अप्रकाशित

अहमदनगर, महाराष्ट्र

8968361211

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