साक्षत्कार
एक अधिवक्ता, अध्यापक और अधिकारी से …

युद्धवीर टंडन की खास रिपोर्ट

आज शिक्षक को सबसे ज्यादा अगर किसी से डर लग रहा तो वो अपने ही अधिकारीयों से लग रहा है| शिक्षक (कुछ जो संयोगवश बने हैं को छोड़ कर) आज अपना काम बड़ी लग्न कर रहा है| बहुत से शिक्षक अपने अपने विद्यालयों में अद्भुत कार्य कर रहे हैं| लेकिन उन्हें भी यही डर सताता रहता है कि कब कौन सा अधिकारी आ जाये और क्या खामी निकाल कर स्पष्टीकरण मांग ले| ऐसे में जो अध्यापक काम कर रहा है या जो काम करना चाहता है वो भी कई बार काम नहीं कर पाता| एक ईमानदार अध्यापक क्या चाहता है ? या यूँ कहें की वो क्या वजह है जो एक ईमानदार अध्यापक को अंदर ही अंदर खोखला किये जा रही है तो जिक्र करना चाहूँगा यहाँ कुँवर बेचैन जी की इन चार पंक्तियों का:-

कि पूरी धरा भी साथ दे तो और बात है,
पर तू जरा भी साथ दे तो और बात है|
कहने को तो इक पैर पर भी चलते हैं लोग,
पर दूसरा भी साथ दे और बात है||

शिक्षक के लिए ही नहीं हर कर्मचारी के लिए उसका विभाग बड़ा मायने रखता है| अगर उसका विभाग उसके अधिकारी उसके साथ न हों तो ये उसके लिए किसी शाप से कम नहीं| वैसे तो बिना शाबाशी के और बिना किसी वाहवाही के भी काम करने वाले अपना काम निरंतर कर रहे हैं| लेकिन फिर भी अगर कोई अपना साथ दे दे तो क्या बात है|

पिच्छले दिनों मुझे जिला सिरमौर के नैना टिक्कर में आयोजित एक राज्यस्तरीय कार्यशाला में शामिल होने का अवसर मिला और इस के शुभारम्भ के सुअवसर पर मुलाकात हुई समारोह के मुख्य अतिथि शिक्षा उपनिदेशक जिला सिरमौर श्री डी. एस. नेगी जी से| उनके विचारों को मैं सुनता इस से पहले ही मुझे उनकी कार्य शैली और स्वभाव के बारे में कुछ सुगबुगाहट सुनने को मिलने लगी| उनकी सादगी पसंद जीवन शैली और निर्भीक कार्यशैली के साथ साथ मुखर अंदाज की चर्चा हर किसी के मुख पर सहज ही सुनने को मिल रही थी| फिर जैसे ही वो अपना वक्तव्य रखने के लिए मंच पर आये तो उनके पहले शब्द सुन कर ही मुझे लगा की जो धुआँ उड़ता हुआ दिख रहा था उसका कारण इस शख्स के अंदर की वो पावन अग्नि ही है और कुछ नहीं और वो शब्द थे की, ‘प्यारे अध्यापक साथियों मैं भी एक अध्यापक ही हूँ’| तभी मैंने मन बनाया की अगर अवसर मिले तो इनका साक्षात्कार अवश्य लूँगा ताकि मेरे अंतर्मन में भी जो सवालों का बवंडर शिक्षा अधिकारीयों को लेकर के उठ रहा है वो शान्त हो सके|

किसी तरह अन्य शिक्षक साथियों की मदद से मुझे वो अवसर भी मिला जब श्री डी. एस. नेगी जी शिक्षा उपनिदेशक जिला सिरमौर (वर्तमान में ओ. एस. डी. शिक्षा विभाग) अपना वादा निभाते हुए सुबह के छः बजे के करीब ही नाश्ता करने के लिए हमारे पास आ पहुँचे| कार्यशाला के शुभारम्भ के अवसर पर जब वो किसी कारणवश हमारे साथ दोपहर का भोजन न कर पाए तो उन्होंने वादा किया की वो तीसरे दिन हमारे साथ नाश्ता व राज का भोजन दोनों करेंगे| मुझे विश्वास नहीं था की सच में उन्हें अपनी कही बात याद होगी परन्तु न केवल उन्हें अपनी बात ही याद थी बल्कि उन्होंने बताये समय से भी पहले ही हमारे बीच आकर हमें चौंका दिया| इतना ही नहीं अचानक साक्षातकार की बात को सुन कर वो सहसा ही मान गये और बड़ी मुखरता से शिक्षा और निजी जीवन से जुड़े प्रश्नों का जबाब दिया|

यह साक्षात्कार अब आपके सामने मूल रूप में प्रस्तुत है जिसे प्रस्तुत करने का एक मात्र उद्देश्य यह बताना है कि एक अध्यापक से अधिकारी बनने का सफर और मुकाम कैसा रहता है|

पहला प्रशन: आपकी शिक्षा कहाँ से हुई ?
जबाब: चूंकि मैं एक सम्पन्न परिवार से था तो द्वितीय कक्षा तक प्राथमिक विद्यालय शिलाई और आगे की देहरादून से|

दूसरा प्रशन: आपके व्यक्तित्व के विकास में किसका योगदान रहा?
जबाब: घर से बहार रह कर आवसीय विद्यालयों में जा कर पढ़ने जो अवसर मिला उसने बहुत कुछ सिखाया|

तीसरा प्रशन: बचपन में आप कैसे थे शरारती या अनुशासित, बचपन की शरारत का कोई किस्सा?
जबाब: पहले शरारती था फिर धीरे धीरे अनुशासन सीख गया| एक बार मैं अपने स्कूल से भाग गया, चूँकि स्कूल बोर्डिंग था तो घर की याद आई और रहा न गया तथा भाग कर पैदल स्कुल से घर शिलाई तक आया| उसके बाद घर वालों ने समझाया और पुनः स्कूल भेज दिया| उस समय के मेरे शिक्षक फ्रेंक्लिन मार्शल ने मुझे दोबार न भाग जाने के डर से एक माह तक मेरे कमरे में बंद रखा, न तो मुझे किसी से मिलने दिया और न ही किसी को मुझ से मिलने दिया| दोस्त घुमने जाते थे पर मैं अंदर ही बंद रहता| लेकिन एक माह के बाद उन्होंने मुझे सुधरने का एक मौका दिया और मेला दिखाने ले गये| उसके बाद मैं अनुशासित हो होकर रहने लगा और मेरे शिक्षक का प्रयोग सफल साबित हुआ|

चौथा प्रशन: आप किनकी बातों को अधिक मानते थे माँ या पिता जी ?
जबाब: मैंने माता पिता की बात बहुत कम मानी जिसका मुझे अफ़सोस है मैं गलत था यह अहसास मुझे बाद में आ कर हुआ| (इसके साथ ने जोड़ते हुए बोले) फिर भी मुझे इस बात की तस्सली है की मैंने अपनी मरी हुई माँ (अचेतन अवस्था) को डेढ़ साल तक जिन्दा रखा (मशीनों के सहारे)| (यह जिक्र करते आँखें नम हो गयीं)

पांचवां प्रशन: आगे की पढ़ाई कहाँ से पूरी की ?
जबाब: एक साल संजोली और दो साल नाहन महाविद्यालय से|

छठा प्रशन: इस दौरान पढ़ाई में कैसे थे?
जबाब: चूँकि जो कुछ महाविद्यालय में पढ़ाया जाता था वो आठवीं या दसवीं तक ही कान्वेंट में पढ़ चुके थे तो अधिक ध्यान नहीं दिया| लेकिन कभी इस बात का खामियाजा नहीं भुगता चूँकि समय रहते पढ़ाई कर लेते थे|

सातवाँ प्रशन: कितना मुश्किल रहता है अलग से कमरे में रह कर स्वयं सारा काम करना और वो भी तब जब आप एक सम्पन्न परिवार से न आते हों ?
जबाब: मुश्किल तो आती ही है चाहे सम्पन्न परिवार का छात्र हो या गरीब परिवार का लेकिन सरकार को चाहिए की वो शिक्षण संस्थान के साथ एक आवासीय परिसर भी बनाये ताकि इस तरह की दिक्कतें न आयें| मुझे अब भी याद है की उस समय कैसे कैरोसीन के लिए जदोजहत करनी पड़ती थी| लेकिन कुछ भी हो वो समय याद आता है|

आठवां प्रशन: आप पेशे से एक वकील भी रहे हैं उसके बारे में कुछ बताइए ?
जबाब: मैंने Central Law University से वकालत की वो दौर जय प्रकाश नारायण, राम लौहिया जी का दौर था और उनसे भी हम काफी हद तक प्रेरित हुए| मैं Unionist भी रहा हूँ| उस समय वकालत एक सम्पन्न परिवार के व्यक्ति का ही पेशा था| तो पैसे कमाने के नजरिये से कम लोग वकालत में आते थे| आज वकीलों में बदलाव आया है जो ठीक नहीं| लेकिन सारे वकील एक जैसे नहीं ठीक वैसे ही जैसे सारे अध्यापक एक जैसे नहीं| केवल 10% अध्यापकों ने ही बाकी के 90% को बदनाम कर के रखा है|

नौवां प्रशन: आपको क्या लगता है कौन सा विकल्प बेहतर है अधिवक्ता या अध्यापक ?
जबाब: पहले लगा की वकालत बेहतर विकल्प है लेकिन बाद में समझ आया की असल में समाज की सेवा करनी है तो अध्यापक ही एक बेहतर विकल्प है| अधिवक्ता बना रहता तो मेरा दायरा सिमित रहता जो की मैं नहीं चाहता था|

दसवां प्रशन: आपने शिक्षक के रूप में कहाँ कहाँ अपनी सेवाएं दी हैं ?
जबाब: कोराग में 1991 से शुरुआत, फिर पौंटा में लड़कों और लड़कियों के स्कूल में|

ग्यारहवां प्रशन: अध्यापक के रूप में आप अपने आप को कैसे देखते हैं ?
जबाब: मेरे हिसाब से मैं सफल रहा चूँकि मेरे 80 फीसदी विद्यार्थी सफल रहे वो आज अच्छे पदों पर या अच्छी जगह हैं| मेरे पहले ही बैच में से दो लड़के सेना में लेफ्टिनेंट बने थे| मेरे सभी विद्यार्थी मेरी ही तरह तेज तर्रार हैं| मेरा अपने विद्यार्थियों के साथ मित्रता पूर्ण रिश्ता रहा है|

बारहवाँ प्रशन: जब आप एक अध्यापक थे उस समय अधिकारियों के बारे में क्या सोचते थे ?
जबाब: अध्यापक के नाते मेरे सभी प्रधानाचार्यों के साथ काफी अच्छे सम्बन्ध थे (एक को छोड़ कर)| सभी मुझ से प्रभावित थे और मैं सब से प्रभावित था| अध्यापक को अधिकारीयों से डरने की जरूरत नहीं है| गलतियाँ सभी से होती हैं और बचपन में ज्यादा होती हैं उम्र बढ़ने के साथ साथ कम होती जाती हैं लेकिन समाप्त नहीं होती| मुझसे आज भी गलतियाँ हो जाती हैं लेकिन मैं उन्हें स्वीकार कर सुधारने में यकीन रखता हूँ|

तेरहवां प्रशन: किसी अधिकारी का अध्यापक को बेवजह डराना या धमकाना कैसे देखते हैं आप इसे ?
जबाब: यह उन अधिकारीयों की निम्न मानसिकता का परिचायक है| मैं उनकी सोच से इतेफ़ाक नहीं रखता| और साथ यह फिर से कहता हूँ की अध्यापक या किसी भी सरकारी कर्मचारी को तब तक डरने या घबराने की कोई जरूरत नहीं हैं जब तक की वो अपनी ड्यूटी पर नियमित है और पैसों का कोई घपला नहीं है| ईमानदार अध्यापक को डरने या घबराने की कोई जरूरत नहीं है| एक अध्यापक के लिए उसके अधिकारी उसके बारे में क्या सोचते हैं यह मायने नहीं रखता उसके बच्चे क्या सोचते हैं उसके बारे में ये मायने रखता है| अधिकारी तो आज कोई है तो कल कोई होगा लेकिन बच्चे वो सदा हमसे और हम सदा उनसे पहचाने जायेंगे| इसलिए उनकी सोच हमारे लिए ज्यादा मायने रखती है|

चोदहवां प्रशन: एक अध्यापक के रूप में कब आपको सबसे ज्यादा खुशी होती है?
जबाब: एक अध्यापक के रूप में मुझे सबसे ज्यादा खुशी उस समय होती है जब हमारे द्वारा पढ़ाये गये बच्चों में हमे हमारा अक्स मजर आये और वो तब भी आपके लिए व्ही सम्मान दिखाएँ जब की वो आप से पढ़ कर आगे बढ़ चुके हों|

पन्द्रहवां प्रशन: बच्चों द्वारा अध्यापिका के बैग उठाने के मामले को आप कैसे लेते हैं ?
जबाब: मेरे हिसाब से यह कोई उतना बड़ा मुद्दा नहीं था जितना की इसे बना दिया गया| मुझे आज भी याद है की जब हम भी बच्चे थे तो इस तरह से गुरुजनों का कोई कार्य करना अपना सौभाग्य समझते थे पर एक होड़ भी होती थी की कौन आज अध्यापक से उनका समान लेता है| तो इसे बेवजह मिडिया द्वारा और अधिकारीयों द्वारा इतना बढ़ा चढ़ा कर पेश किया गया|

सोलहवां प्रशन: आपके वर्तमान में क्या उद्देश्य हैं एक उपनिदेशक की हैसियत से सिरमौर को लेकर?
जबाब: मैं अध्यापकों के कार्य को जल्दी से जल्दी निपटा दूँ| कोई भी मेरे कार्यालय से ये सोच के ना जाये की मेरा फलां काम हो सकता था पर नहीं हुआ| और इसके साथ ही मैं चूँकि कानून जनता हूँ तो जो भी मुकद्दमे विभाग पर हैं उन्हें जल्द से जल्द निपटाना चाहता हूँ| ताकि विभाग पर मुकद्दमों का बोझ कम हो साथ ही अध्यापकों की भी जायज मांग है तो उसे भी मैं मानूगा ताकि भविष्य में कम से कम अदालती मुकद्दमें विभाग पर हों|

सत्रहवां प्रशन: PTF को आप किस प्रकार देखते हैं ?
जबाब: मेरे हिसाब से तो वो अध्यापकों के लिए कोई खास अच्छा काम नहीं कर रही है|

अठारवां प्रशन: आप उन्हें क्या संदेश देना चाहेंगे जो अभी शिक्ष्ण व्यवसाय में आये तो नहीं हैं लेकिन आने का विचार बना रहे हैं?
जबाब: मेरा एक ही संदेश है कि अपनी इच्छा से न की संयोग से अध्यापक बनें और हाँ एक बात और आप उद्देश्य आने वाली पीढ़ी को सुधारना हो न कि कोई और अगर कोई उद्देश्य आपका है तो किसी और व्यवसाय में आप जा सकते हैं आप के सभी अवसर खुले हैं|

ये था मेरी जिन्दगी का पहला साक्षात्कार मैंने पूरी कोशिश की मन में उठ रहे सभी सवालों को पूछूं और मैं शुक्रगुजार हूँ उपनिदेशिक महोदय जी का जिन्होंने मेरे हर सवाल का बड़ी बेबाकी से जबाब दिया| अपने नाश्ते को मेरे सवालों के लिए ठंडा किया साथ ही मैं सभी शिक्षक साथियों का भी आभारी हूँ की उनके प्रोत्साहन से मैं यह सब कर पाया| खास तौर पर श्री सुनील पराशर जी BRCC सराहां व श्री शिशुपाल भरद्वाज जी का जिनका इस प्रयास में मुझे सर्वाधिक योगदान मिला|

इस साक्षात्कार में अगर कोई भी टंकण सम्बन्धी अशुद्धी हो या कोई और गलती तो कृपा करके पहला प्रयास समझ कर माफ़ करें| आपको यह प्रयास कैसा लगा जरुर बताएं और साथ ही अपनी प्रतिक्रियाएं भी जरुर दें| अंत में बस यही कह कर अपनी लेखनी को विराम देना चाहूँगा:

तेरे गिरने में तेरी हार नहीं
तू इंसान है कोई अवतार नहीं

जय हिन्द


युद्धवीर टंडन (कनिष्ठ आधारभूत शिक्षक रा. प्रा. पा. अनोगा) गावं तेलका जिला चम्बा हि. प्र. पिन कोड 176312 मोब. 78072-23683