नदी आँख से फिर बही रात भर
वही दास्ताँ फिर कही रात भर

सभी तोड़ कर बाँध दिल रो पड़ा
झड़ी आँसुओ की लगी रात भर

तेरी याद ने फिर लि अँगड़ाई वो
हरेक पल बिता इक सदी रात भर

रहा आँसुओ में तेरा अक्स ही
दिले आरजू फिर जली रात भर

वही सिसकियाँ ,आहें भी थी वही
रही फिर वही बे खुदी रात भर

उभर आये मंजर वही आँख में
नजर ढूँढती ही रही रात भर
( लक्ष्मण दावानी ✍ )