ग़जल

मैं अक्सर अपनी औकात भूल जाता हूँ
सही और अच्छे ख्यालात भूल जाता हूँ।

उजड़ गई दुनियां निशानात भूल जाता हूँ
आँखों से वरसी वो वरसात भूल जाता हूँ।

देती रही है जिन्दगी बेहिसाब कुर्बानयाँ
किसलिये क्यूँकर वो हालात भूल जाता हूँ।

अंधों की नगरी के हम भी तो थे बशिन्दे
मुश्किल जीना औ’ जज्वात भूल जाता हूँ।

रह रह के याद आयें नजदीकियाँ वो तेरी
वो मौत का मंजर वो वारदात भूल जाता हूँ।

जहां तक भी देखता हूँ वीराना ही वीराना
वर्फ लदे पहाड़ औ’ जंगलात भूल जाता हूँ।

हैं मेहनत कश बहुत किसान मेरे देश के
अब मैं अमरीकन वो खैरात भूल जाता हूँ।

तेरी चाहत में जीना क्यूँ अभिशाप हो गया है
वो साँसौं की गर्मी वो मुलाकात भूल जाता हूँ।

ढलती उमर में पत्नी अब गुरु हो गयी है
चरण देखता हूँ सुहागरात भूल जाता हूँ।

सच और झूठ में दिखता नहीं है अन्तर
अहंकार में ‘उसकी’ करामात भूल जाता हूँ।

क्या कहना है अब इस भयावह जिन्दगी का
पूछे हुए वो खुद को सवालात भूल जाता हूँ।

तेरी चाहत को रखा मैंने सीने में छुपा कर
निराश तुझ से अपनी गलबात भूल जाता हूँ।

सुरेश भारद्वाज निराश
धौलाधार कलोनी लोअर बड़ोल
पीओ दाड़ी धर्मशाला हिप्र
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