शिव का डमरू/पंडित अनिल

शिव का डमरू

माहेश्वर का डमरू बाजे , जग गतिमान हो जाये ।
सूरदास को सूझे सब कुछ , गूँगा गीत सुनाये ।।
मृग की छाला बाँधे कटि, तटि में श्रृंगी लटकाये ।
शीश पे शीतल गंगा ,कल कल ध्वनि करती मुस्काये।।

नंदी के पाँवों में घुँघुरू , घंटी घनन गल डोले ।
बिषधर कानों में शिव के ,ना जाने क्या रस घोले।।
नीलकंठ कैलाशी संग , माँ पारबती हरषायें ।
गंणपति लाला गोद अनिल लखि, नैनन बलि बलि जाये ।।

पं अनिल

अहमदनगर महाराष्ट्र

यंहा है शिव का अर्धनारीश्वर रूप-शिवरात्रि विशेष

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