पड़ोसी को हम कैसे बदलें


गढ़े मुर्दों को अब मत और उखाड़ो, भद्दी बातों पर अब पर्दा डालो।
अच्छाईयां सबकी तुम ले लो, बुरी बुराई उसकी गोद में डालो।
दो दिन का तो जीवन है यह, कभी किसी से मत कड़वा बोलो।
दो तोले की ये जीभ हमारी, सर सर करती यह कभी न थकती।
क्या बोलें और क्या न बोलें, बोलने से पहले शव्द को तोलो।
निकली मुंह से बात न वापस आए, बड़े बड़े कुफ्र यह ढाए।
अपनों को यह बेगाना कहती, गुस्सा आए तो मन में पी लो।
दुर्गंध में कभी न पत्थर फेंको, अपने भीतर तुम हरदम झांको।
परिमल हर सू सुगंध विखेरो, दुर्गंध पर तुम मिट्टी डालो।
पथ चलते जो तुम को मिलता, वही सगा है अपना प्यारा।
मीठी उससे दो बातें कर लो, इसी में बहती है प्रेम की धारा।
दो बर्तन जो होंगे रखे घर में, वो भी तो अक्सर टकराते हैं।
मन मुटाव में रखा क्या है, मिल बैठकर सलाह मशविरा कर लो।
दोस्त तो बदले जा सकते हैं, पड़ोसी को हम कैसे बदलें।
प्रेम से रहना उसे सिखाओ, कह दो मुर्दे गढ़े अब न और उखाड़ो।
बनती बात न कभी बिगाड़ो, अपना घर बसता न और उजाड़ो।
पाकिस्तान से कह दो जा कर, जोरा जोरी न और चलेगी।
बेपर्दा अब तुम हो चुके बहुत हो, सीनाजोरी न अब काम करेगी।
अच्छे पड़ोसी सम रहना सीखो, कारस्तानी अब करना छोड़ो।
कश्मीर में दखलंदाजी छोड़ कर, मुंह आतंकियों का घर को मोड़ो ।
आस्तीन में सांप और न पालो, अच्छे पड़ोसी सम रहना सीखो।
वरन् चूड़ियाँ हमने नहीं पहनीं, कश्मीर की रट लगाना अब तुम छोड़ो।
अच्छे पड़ोसी के गुण सब अपना कर, जन विकास में ध्यान लगाओ।
परिमल भलाई इसी में हम सबकी, भारत को तुम न अब और सताओ।
नंद किशोर परिमल, गांव व डा, गुलेर
तह, देहरा, जिला, कांगड़ा (हि, प्र)
पिन – 176033, संपर्क, 9418187358