कलयुगी वेटा)
जिस मां ने बड़े नाजों से था वेटे को पाला।
उसीने छतसे धकेला और मां को मार डाला।
मां ने सोचा मुझे छत पर ले जाकर मेरा प्यारा वेटा।
धूप सेंकाएगा, मीठी बातें सुनाएगा और मेरा मन बहलाएगा।
पर यह तो कलयुगी वेटा ढीट और बेशर्म कितना निकला।
फर्ज भूल अपना,मां के दूध का कर्ज इसने अपना कैसे चुकाया।
खुद गीले में थी सोती और सूखे में अपने प्यारे वेटे को सुलाए।
बोलना सिखाती, सुख सुविधा जुटाती, दूध छाति का पिलाए।
वही है यह कलयुगी वेटा जिसे जग में लाकर, था जीना सिखाया।
कैसा है उसीने यह फर्ज निभाया, धक्का छत से देकर मां को मार डाला।
जब जब वेटे को जरा सा भी दर्द होता, मां तब तब थी जग जाती।
सोता न जब तक वो प्यारा वेटा, थी लोरियाँ दे दे कर उसे वो सुलाती।
बुरा वक्त जब मां का आया, देखो उस वेटे ने किस तरह अपना फर्ज निभाया।
छत पर ले जाकर उसी प्यारी मां को, धक्का दिया और मौत की नींद सुलाया।
धिक् धिक् ऐसे नौजवान वेटे पर, विश्व को भी उस पर है शर्म आती।
दुनिया इस घिनौनी हरकत पर, उसे सौ सौ बारंबार फटकार लगाती।
रुक ठहर और देख जरा, तेरे बच्चे भी इसी तरह तुझको घेरेंगे।
बूढ़ा होने पर वे भी तुझे इसी छत पे लाकर खींच खींच कर मारेंगे।
तब तूं रोए और अफसोस मनाए, पर काम तब वो कुछ नहीं आएगा
बोझ बना है तूं धरती पर, जीवन भर तूं भी घुट घुट कर अब रोएगा।
परिमल पूछे कारण क्या है, आओ मिलकर सब यह विचार करें।
ऐसी घटना के पीछे भी तो कुछ कारण होगा, आओ मिलजुल कर उसको ढूंढें।
आओ मिलजुल कर उसको ढूंढें।
नंद किशोर परिमल, गांव व डा, गुलेर
तह, देहरा, जिला, कांगड़ा (हि – प्र)
पिन, 176033, संपर्क – 9418187358

बसंत
मदमाती, इतराती, इठलाती,
ऋतु बसंत की है आई।
पेड़ों_फूलों पे नव यौवन आया,
साथ में ठंडी हवाएं लाई।
पीली सरसों खिली खेत में,
किसान के मन पे खुशी है छाई।
पंजाबी गिद्दा जट्ट नें डाला,
क्या बढ़िया है बजे शहनाई।

पतंगें लेकर निकले सब बच्चे,
घर आंगन में खुशी है छाई।
झर-झर, झर – झर पानी बहता,
कोयल कू-कू करती आई।
आज अकेला कोई रह न पाता,
सबके मन पर मस्ती छाई।

शरद ऋतु है बूढ़ी हो गयी,
बसंत नव यौवन लेकर आई।
आया बसंत पाला उड़ंत,
सबके मुंह पर बात यह छाई।
आओ मिल – जुल खुशियाँ बांटें,
प्यार भरी बसंत जो ऋतु है आई।
माता बहिनें पकवान पकातीं,
सबको अपने घर द्वार बुलातीं।
परिमल मीठे गाने गाता,
देख बसंत की सब पर मस्ती छाई।।
नंदकिशोर परिमल
गुलेर (कांगड़ा) हि_प्र
पिन 176033