“लोह्ड़ी”
जिंह्याँ चलदी चाल मकोड़ी।
हौळें-हौळें आई लोह्ड़ी।।
ठंडू ठुड्ड भनाई लेया।
हड्डळुआँ गर्माई लोह्ड़ी।।
सुभ कम्माँ दा वेल्ला आया।
मुंडन ताँ कुड़माई लोह्ड़ी।।
दुल्ला भट्ठी अॉळा पुच्छै।
थी थोड़ी सरमाई लोह्ड़ी।।
खाण रयोड़ी मुंगफली या।
तिलचौळी मनभाई लोह्ड़ी।।
वॉळी भाँबळ नच्च कुदैह्ड़ा।
ढोल्ली ढोल बजाई लोह्ड़ी।।
दाख छुआरे गोळे गरिया।
दा गळ हार पुआई लोह्ड़ी।।
सुख सांती घर बरकत होऐ।
छोड़ी औणी तांईं लोह्ड़ी।।
बोल ‘नवीना’ उच्चे घॉयें।
होऐ अज्ज बधाई लोह्ड़ी।।
नवीन शर्मा
गुलेर-कांगड़ा
१७६०३३
?९७८०९५८७४३
“लोहड़़ी”
चल सूरज उत्तर की ओर।
सर्दी का ज्यादा है ज़ोर।।
धनु से मकर गये तुम जब तो।
देवगणों की सुंदर भोर।।
मुंडन ओर विवाह जुड़ेंगे।
ढोल नगाड़ोंं का हो शोर।।
लोह्ड़ी पोंगल माघी बोलें।
नाचे सबके मन का मोर।।
गंगा तट पर भीड़ बढ़ेगी।
इक डुबकी भेंटै चितचोर।।
तिल चौळी गुड़ डाल बनाई।
अम्माँ मेरी भाव विभोर।।
अाग जलाकर आहुति डालें।
मांगें खैर रहे चहुँ ओर।।
खूब बनायें बच्चे टोली।
मुंगफली के चलते दौर।।
लोह्ड़ी मांग रहे जन मन जी।
दे दाता सबको भर कौर।।
सबके जीवन में चमके तूँ।
सूरज तेरा ओर न छोर।।
यूँ ही देख चमकते रहना।
तुझसे है सांसों की डोर।।
नित्य ‘नवीन’ रहो हे स्वामी।
भक्त निहारें तेरी ओर।।
नवीन शर्मा
गुलेर-कांगड़ा
१७६०३३
?९७८०९५८७४३