हाथों की थपकियाँ/कवि राजेश पुरोहित

हाथों की थपकियाँ
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माँ की गोद व हाथों की थपकियाँ।
बच्चों को नसीब नहीं होती है।।

मेहनत कर जब घर लौटती माँ।
अब संतान से रूबरू नहीं होती है।।

उन्हें सहलाती दुलराती पुचकारती।
अब देहरी पर खड़ी नहीं होती है।।

इंटरनेट के युग में सब कुछ बदला।
रिश्तों में अब मिठास नहीं होती है।।

भाग्य विधाता सो रहे जब देश के।
उन्हें वक़्त की कीमत नहीं होती है।।

जो रखते गैरों का ख्याल अक्सर।
कामयाबी उनसे दूर नहीं होती है।।

देश बदल रहा सुना और पढ़ा भी।
किसी की आंख नम नहीं होती है।।

खुशहाली के मंजर अब नहीं यहाँ।
अब चेहरों पर हंसी नहीं होती है।।

कवि राजेश पुरोहित
भवानीमंडी

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